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अभियुक्त रमेश कुंजाम पर भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 302 के अंतर्गत दण्डनीय अपराध का यह आरोप है कि दिनांक 19.08.2022 की दोपहर करीब 1 बजे से 4:30 बजे के मध्य पुलिस थाना कुंडम, जिला जबलपुर अंतर्गत ग्राम सहदरा व मिडिल स्कूल के बीच रोड के किनारे स्थित महुआ के पेड़ के पास उसने साशय एवं ज्ञान सहित किशोरी लाल यादव पर डंडे के प्रहार से उसे प्राणघातक उपहति कारित कर उसकी हत्या की। इस मामले में यह अविादित है कि अभियुक्त को दिनांक 21.08.2022 को गिरफ्तार किया गया था। संक्षेप में अभियोजन का मामला इस प्रकार है कि आरक्षी केन्द्र कुण्डम में पदस्थ निरीक्षक प्रताप सिंह मरकाम को दिनांक 19.08.2022 को मोबाईल के माध्यम से इस आशय की सूचना प्राप्त हुई कि ग्राम सहदरा में मिडिल स्कूल एवं सहदरा के बीच रोड के किनारे, महुआ के पेड के पास एक व्यक्ति मृत अवस्था में पडा हुआ है, उक्त सूचना पर प्रताप सिंह मरकाम अपने स्टाफ के साथ घटनास्थल पर पहुंचे जहां कोटवार बिहारी सिंह द्वारा इस आशय सूचना दी कि वह ग्राम सहदरा का कोटवार है, ग्राम केरीटोला में दिनांक 19.08.2022 को मटकी फोड प्रतियोगिता का अयोजन था जहां से वह लगभग 1.00 बजे अपने घर आया था, करीब 4.30 बजे उसे गांव के लोगों ने उसे बताया कि मिडिल स्कूल एवं सहदरा के बीच रोड किनारे महुआ के पेड के पास करीब 65 वर्षीय अज्ञात वृद्धका शव खून से लथपथ पडा है तब उसने जाकर देखा तो उसे करीब 65 वर्षीय एक अज्ञात वृद्ध पुरूष, जिसके सिर व दाढी के बाल पके, गले में सफेद गमछा, धोती व पैरों में प्लास्टिक के पुराने जूते थे तथा सिर, आंख, नाक, मुंह में चोट थी दांत टूटे थे तथा एक दांत पास ही पडा था, पूरा मुंह खून से लथपथ था, का शव मिला जिसे वह नहीं जानता है। वादी द्वारा जिस दस्तावेज दिनांक 23.05.1974 का हवाला, आवंटित किए गए भवनों को विक्रय किये जाने के संबंध में दिया गया है, वह दस्तावेज कूटरचित एवं फर्जी है क्योंकि प्रतिवादी संस्था के उपनियमों के अनुसार किसी भी व्यक्ति विशेष एवं पदाधिकारी को प्रतिवादी संस्था की संपत्ति को विक्रय करने या हस्तांतरण करने का अधिकार नहीं था। प्रतिवादी संस्था ने वादग्रस्त भवन का विक्रय करने हेतु कभी भी कोई मौखिक संविदा वादी के पिता अथवा वादी से नहीं की थी और न ही कभी कोई मौखिक आश्वासन वादग्रस्त भवन को विक्रय करने हेतु दिया था। वादी के पिता ने वादग्रस्त भवन को क्रय करने हेतु अग्रिम के रूप में पांच हजार रुपये की राशि कभी भी प्रतिवादी संस्था को अदा नहीं की है। वादी वादग्रस्त भवन में किरायेदार के रूप में निवासरत है एवं प्रतिवादी एवं वादी के मध्य भवन स्वामी एवं किरायेदार के संबंध हैं। वादी विगत् 40 वर्षों से प्रतिवादी संस्था के किरायेदार के रूप में वादग्रस्त भवन में निवासरत है तथा स्वयं उसने प्रतिवादी संस्था को भवन स्वामी माना है एवं किरायेदारी को स्वीकार किया है तथा वर्ष 1975 से 2013 तक वादी ने म.प्र. हाउसिंग बोर्ड अथवा वादी संस्था के विरूद्ध कथित मौखिक विक्रय अनुबंध का पालन कराये जाने हेतु कभी भी कोई कार्यवाही नहीं की और वर्ष 2013 तक तो मौखिक विक्रय अनुबंध होने का कोई खुलासा भी नहीं किया गया और इतने लंबे अंतराल के बाद मिथ्या तथ्यों के आधार पर यह वाद प्रस्तुत किया गया है जो गुणदोषों के साथ-साथ अवधि बाह्य होने के कारण भी निरस्त किए जाने योग्य है। उपरोक्त अभिवचनों के आधार पर विद्धान विचारण न्यायालय ने निम्नलिखित वादप्रश्नों की रचना की और विचारण उपरांत अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य का विवेचन कर निम्नानुसार निष्कर्ष अंकित किये हैं:- इस प्रकार विद्धान विचारण न्यायालय ने इस तथ्य को प्रमाणित नहीं पाया कि प्रतिवादी संस्था ने वादग्रस्त भवन क्रमांक बी-15 वादी को विक्रय करने का विधिपूर्ण मौखिक अनुबंध किया था और ऐसे अनुबंध के पालन में प्रतिवादी संस्था ने वादी के हित में विक्रय पत्र का निष्पादन करने से अवैध रूप से इंकार किया है।
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