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प्रचीन काल में कन्यादान के समय पिता स्वेच्छा से अपनी सामर्थ्य के अनुसार कन्या को कुछ उपहार देता था। उस समय यही शुभकामना रहता थी कि कन्या अपना नया घर अच्छी तरह बसा सके और उसे कोई असुविधा न रहे। इसलिे दहेज के रूप में उसे आवक्यक चीजें दी जाती थीं। धन संपन्न लोग अपार धनराशि तक दान में देते थे परंतु परवर्ती काल में कनयादान की प्रथा विकृत होने और अच्छे वर की तलाश में मुंह मांगा दहेज देने लगे। कुछ लोग अपना बड़प्पन जताने के लिए अधिक दहेज देने लगे। परिणामस्वरूप समाज में कन्या को भारस्वरूप माना जाने लगा। लगभग डेढ़ सौ वर्ष तग दहेज के कारण अन्य कुप्रथाओं ने जन्म लिया जैसे बहु विवाह, बाल विवाह, कन्या को मन्दिर में चढ़ाना या देवदासी बनाना। कुछ जातियों के लोग तो कन्या का जन्म होते ही उसे दफना देते थे।
वर्तमान समय में हमारे देश में दहेज प्रता अत्यंत विकृत हो गई है। आजकल वर पक्ष वाले अधिक से अधिक दहेज मांगते हैं। वे लड़के के जन्म से लेकर पूरी पढ़ाई-लिखाई, विवाह का खर्च तक मांगते हैं। साथ ही बहुमूल्य आभूषण एवं साज-सामान भी मांगते हैं। कन्या का पिता यदि मनचाही सामग्री या धनराशि वर क्ष को नहीं दे सकता है तो नौबत यहां तक आ जाती है कि दूल्हे सहित बारात लौट जाती है अथवा मण्डप में से दूल्हा उठकर चला जाता है। विवाह के पश्चात् भी दुल्हन को मंुहमांगा दहेज न लाने के कारण परेशान किया जाता है। ससुराल में सास व ननद उसे तंग करती हैं अथवा उसे मार डालती हैंं। अखवारों में अाए दिन ऐसे समाचार छपते रहते हैं।