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Shahnoor
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शारीरिक अपगंता, सीमित सक्रियता और सहभागिता में बाधाएं ये वे शारीरिक अवस्थाएं हैं जो विकलागंता कहलाती हैं। किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य की स्थितियां और उनके निहितार्थ उसके दिन-प्रतिदिन के सामाजिक-आर्थिक पर्यावरण में दृष्टिगोचर होते है। विकलागंता के बारे में हमारी सोच अब जीव-वैज्ञानिक परिदृश्य से हटकर सुलभ्यता, समावेशन और सशक्तीकरण के प्रश्नों पर टिक गई हैं। सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय लोग और नीति नियंता अब विकलागंता के मुद्दे पर अधिकार आधारित और समावेशन की दृष्टि से विचार करते हैं। भारतीय संविधान की धारा-41 में कार्य और शिक्षा के संदर्भ में विकलागंता का उल्लेख किया गया हैं। सरकार ने भी केवल कल्याणकारी नीतियों से आगे बढ़ते हुए विकलागंता के बारे मे अधिकार आधारित दृष्टिकोण अपनाया हैं। इसी क्रम में विकलागंजन (अधिकारों को समान सरंक्षण एवं पूर्ण सहभागिता) अधिनियम, 1995 में संशोधन का प्रस्ताव है और नया विधेयक विचारधीन हैं। प्रस्तावित विधेयक के प्रारूप में प्राधिकार की बहुलता और एक उद्देश्य के निमित्त अनेक संस्थाओं की स्थिति से बचने के लिए विकलागंता के चार वर्तमान कानूनों को समाप्त करने का प्रस्ताव हैं।