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asthashakya
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हाल के राज्यसभा चुनाव के बाद उच्च सदन में भाजपा और उसके सहयोगी दलों की संख्या कांग्रेस एवं उसके सहयोगी दलों के मुकाबले अधिक होने से सत्तापक्ष का उत्साहित होना स्वाभाविक है, लेकिन अभी इतना अंतर नही है कि भाजपा की और से ऐसा कोई दावा किया जा सके कि राज्यसभा में उसकी बाधांए दूर हो गई है। एक तो विपक्ष संप्रग के मुकाबले राजग की केवल चार सीटें है और दूसरे, जो अन्य तल है उनकी अच्छी-खासी संख्या है और उनके बारे में यह कहना कठिन है कि किसी विधेयक पर वे क्या रुख अपनाएंगे हां, इतना अवश्य है कि गैर भाजपा और गैर कांग्रेस दलों में से ज्यादातर दल ऐसे है जो मुद्दा विशेष पर अपने रुख-रवैये का निर्धारण करते रहे हैं। सत्तपक्ष के लिए एक अन्य उत्साहजनक बात यह भी है कि पिछले विधानसभा चुनाव जिन राजनिततिक परिस्थतियों में हुए उन्हें देखते हुए इसकी सभांवना कम है कि अब तृणमूल कांग्रेस किसी मसले पर कांग्रेस किसी मसले पर कांग्रेस सैद्धातिक तौर पर जीएटी विधेयक के समर्थन में दिख रही है। तृगमूल कांग्रेस के साथ-साथ अन्नाद्रमुक और कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों का रुख भी सकारात्मक है। इन परिस्थितयों में यह आवश्यक हो जाता है कि संसद के अगले सत्र में जीएसटी विधेयक को पारित कराने की हरसंभव कोशिश की जाए। वैसे भी इस विधेयक के पिरत होने में आवश्यकता से अधिक देर हो चुकी है और इस देरी के कई दुष्पारिणाम भी गिनाए जाने लगे है। यह आम धारणा है कि इस विधेयक के पारित से जेडीपी में इतनी वृद्धि अर्थव्यवस्था के कायाकल्प में सहायक साबित होगी।
चुंकि जीएसटी संविधान विधेयक है इसलिए सत्तपक्ष को जरूरू संख्या जुटाने के लिए विशेष प्रयत्न करने होंगे। बेहतर हो कि सत्तापक्ष यह समझे कि चुंकि जीएसटी विधेयक में कही अधिक देरी हो चुकी है इसलिए सर्वसम्मति बनाकर इस विधेयक को पारित कराने के इरादे का परित्याग करना ही उचित है। कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि जरूरी संख्याबल हरसंभव तरीके से जुटा लिया जाए। इस काम में सफलता तभी मिलेगी जब कांग्रेस और उसके साथ खड़े एक-दो अन्य दलों को अलग-थलग किया जाएगा। जीएसटी के मामले में कांग्रेस ने जैसा रुख-रवैया अपना लिया है उसे देखते हुए उससे समझौते की अब कोई गुंजाइश ही नही बनती। जीएसटी विधेयक पारित करने में अपने सहयोग को कांग्रेस ने जिस शर्तों के साथ संबद्ध कर दिया है वे अस्वाभाविक भी है और एक आवशयक सुधार में उसकी अड़ंगेबाजी का प्रमाण भी। यह उल्लेखनीय है कि अगले सप्ताह कोलकाता में एक आदर्श जीएटी विधेयक का प्रारूप तैयार करने के लिए राज्यों के मुख्यमंत्रियो की महत्वपूर्ण बैठक होने जा रही है। चुंकि इस बैठक में इस दौरान न केवल विधेयक के मसौदे को लेकर राज्यों के सभी तरह के मतभेदों को दूर कर लिया जाएगा, बल्कि इसके आधार पर संसद के अगले सत्र में जीएसटी विधेयक पारित करने की राह भी तैयार हो जाएगी। एक ऐसे सुधार में और अधिक देरी का कोई औचित्य नहीं जो अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ ही बड़े पैमाने पर रोजगार के सृजन में सहायक बनने वाला हो।