words per minute

13

bpojha1030


00:00

Speed

ाफ है, देश के सामने जल संकट की जो भीषण समस्या खड़ी हुई है, उसका सामना तभी किया जा सकता है, जब केन्द्र एवं राज्य सरकारों के साथ, उनकी विभिन्न एजेंसियों के साथ समाज भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह सही तरीके से करे। वैसे हमारे देश में पानी का बहुत बड़ा संकट नही है, लेकिन उसका जरुरत से ज्यादा इस्तेमाल, जल की बर्बादी का सबब बन रहा है। इस बर्बादी पर अंकुश ढूँढने की बजाय, उनके सामाधान तलाश लिये जाएँ तो एक तक पानी के संकट का निवारण हो सकता है। इन उपायों के सिलसिले में पानी को कानून के दायरे में लाने की कई स्तर पर पहल हो रही है। नोबेल पुरस्कार विजेता और समाजसेवी कैलाश सत्यार्थी ने पानी पर आपातकाल लगाने की बात करके जलसंकट पर नए तरह का विमर्श छेड़ने की कोशिश की है। दूसरी तरफ जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने ताजा शुद्ध जल के समुचित उपयोग के लिये जल कानून बनाने की बात की है। तीसरी बात लोकसभा की जल से सम्बन्धित स्थायी समिति ने उठाते हुए, जल को संविधान की समवर्ती सुची में डालने की सिफारिश की है। विधि आयोग की भी यही सिफारिश है।राज्यसभा में जदयू के सांसद शरद यादव ने जल को केन्द्र के अधिकार क्षेत्र में लाने की बात उठाई है। साफ है, लगातार दो मानसून कमजोर रहने और मराठावाड़, विदर्भ, बुन्देलखण्ड तथा कालाहांडी में पानी को लेकर जिस तरह के भयावह हालात निर्मित हुए हैं, उसके कईं समस्या के कानूनी हल तलाशे जाने के मुद्धे बहुरूपों में सामने आये हैं। वैसे पानी, शिक्षा, और स्वास्थ्य की तरह संविधान की मूलभूत आवश्यकताओं में शामिल है। लिहाजा विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या पानी को कानून के दायरा में ला देने भर से समस्या का हल सम्भव है। क्योंकि शिक्षा को शिक्षा का अधिकार कानून से जोड़ने के बावजूद शिक्षा में व्यापक बदलाव नहीं आये हैं। प्यासे देश में बाढ़ सुखाड़ के जो हालात बने हैं, वे मानवनिर्मित घटनाक्रमों की देन हैं। औद्योगिकिकरण और शहरीकरण जिस सुरसामुख की तरह फैल रहे हैं, उसी का परिणाम है कि पहली बार देश में पेयजल संकट इतने बड़े हिस्से में त्रासद रुप में असर दिखा रहा है। नतीजन सूखा प्रभावित क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बच्चों को पढ़ाई छोड़कर बाल मजदूरी करने को मजबूर होना पड़ा है।
words per minute
0
wpm
accuracy
0%
Text Practice - Time 966 - English

words per minute