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shubhamgoel
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आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हर कोई सबसे आगे जाना चाहता है। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि हर कोई जीतना चाहता है। जीत का जज़बा किसी भी देश के विकास का सुचक है। परन्तु इस बात पर गौर करना ज्यादा जरूरी है कि हमने सफलता की रेस में आगे बढने के लिए ईमानदारी से कितनी कोशिश की। जिंदगी की प्रत्येक रेस में कभी किसी को जय मिलती है तो कभी किसी को पराजय का सामना करना पड़ता है। लेकिन यदि हम अपना दिमाग खुला रखें तो हर अनुभव हमें समृद्ध बनाता है। सही अभ्यास के साथ जब भी हम अपनी बंधी-बंधाई योग्यता से ऊपर उठकर कुछ करने की कोशिश करते हैं तो ज्ञान और हौसला दोनो ही बढता है।
बचपन में हम सभी को कई नैतिक तथा मनोबल बढाने वाली कहानियां सुनाई जाती थी, जो आज भी शुरुवाती कक्षाओं में पढाई जाती हैं। बचपन में शायद उन कहानियों का आशय समझ में न आता हो किन्तु समय के साथ जिसने भी उन कहानियों का गूढ अर्थ समझ लिया उसने सफलता की इबारत लिख दी है। ऐसी ही एक कहानी थी खरगोश और कछुए की जिसे लगभग हम सभी ने पढी होगी।
जिसमें, एक जंगल में खरगोश और कछुए के बीच एक प्रतियोगिता का आयोजन रखा गया था कि, लक्ष्य तक कौन तेज दौङकर पहुँचेगा। जाहिर सी बात है दोनो की चाल में जमीन आसमान का अंतर था। मुकाबला एकतरफा ही नजर आ रहा था फिर भी कछुए ने चुनौती स्वीकार कर ली। रेस शुरु हुई खरगोश अपनी तेजरफ्तार से काफी आगे निकल गया। कछुआ धीरे-धीरे चल रहा था किन्तु निरंतर चल रहा था। जबकि अति आत्मविश्वासी खरगोश ने सोचा कि मैं तो बहुत आगे आ गया हुँ तो थोङा आराम कर लेता हुँ। पेङ के नीचे लेटते ही उसे गहरी नींद लग गई। वहीं कछुआ धीमी गति से बिना किसी विश्राम के निरंतर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँच गया। असंभव संभव में परिणित हो गया। खरगोश की तेज चाल भी निरंतर और सतत अभ्यास से हार गई थी। खरगोश की हार से ये भी सबक मिलता है कि जब तक लक्ष्य हासिल न हो जाये आराम या आलस के वशीभूत नही होना चाहिए।
खरगोश और कछुआ तो प्रतीक मात्र हैं। यदि हम अपने आसपास नजर दौङाएं तो हम लोगों की कार्यपद्धति भी इन्ही दो श्रेणियों में बंटी है। कोई निरंतर अभ्यास से अपनी कार्यकुशलता को निखारता है और लक्ष्य के लिए जुनून की हद तक कोशिश करता है, तो कोई अतिआत्मविश्वास की वजह से, सक्षम होते हुए भी लक्ष्य तक नही पहुँच पाता है। क्षेत्र कोई भी हो, नई-नई चीजों को सीखना, नई परिस्थितीयों में खुद को ढालना सफलता का प्रमुख सबक है। अभ्यास के दौरान कभी-कभी नकारत्मक भाव आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है किन्तु उसे स्वंय पर हावी होने देना सफलता की सबसे बङी बाधा है। आशावादी दृष्टीकोंण को सदैव अपनी सांसो की रफ्तार के साथ रखना चाहिए।