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भारतीय नारी और साड़ी परस्पर अभिन्न है। साड़ी के तार-तार में भारतीय नारी की पहचान के साथ-साथ सांस्कृतिक गरिमा की प्रस्तुति बनी हुई है। साड़ी भारतीय संस्कृति की जीवन्त परम्परा है जिसकी अपनी भाषा है अपना व्याकरण है अपना संदेश है। वर्तमान युग में भले ही कामकाजी महिलाओं के लिए सूट अधिक सुविधाजनक होने के कारण प्रचार में आ गए हों परन्तु उनके साथ भारतीय संस्कृति का इतिहास और गौरव कतई मेल नहीं खाता। अपनी विशाल ५-६ मीटर की लम्बाई में काल व स्पेस की प्रतीकात्मकता जैसी सृजनता किसी और ड्रेस में है ही नहीं। विभिन्न मनोदशाओं, अभिरुचियों, प्राकृतिक परिवेश, क्षेत्रीय सौरभ की इन्द्रधनुशी, आभा को प्रसारित करती साड़ी को विधिवत् साहित्य में भी श्रृद्धास्पद स्थान प्राप्त है। जीवन और समाज की केन्द्रीय भावधारा से जुड़ी साड़ी का उल्लेख विभिन्न रुपों-स्वरुपों में अंकित है। वैदिक साहित्य में सिरी शब्द की उल्लेख मिलता है। जो कि संभवत तमिल सिरी या सिलाई से लिया गया है। साड़ी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के सानी शब्द से मानी गयी है जिसका अर्थ है- आवरण या ढकने वाला कपड़ा । प्राकृत भाषा में यह शब्द सादी कहलाने लगा बाद में साड़ी प्रचलित हो गया। ऋग्वेद में स्वर्ण से बुने हुए वस्त्र का हिरणद्वायी के नाम से वर्णन मिलता है। शत् ब्राहमण व काठक संहिता में तो दुरुखा नामक कढ़ाई का भी उल्लेख है जिसमें वस्त्र के दोनो ओर एक जैसी कढाई होती थी जो आज भी माहेश्वरी साड़ियों में प्रचलित है। महाकाव्य काल में मोतियों की झालर से युक्त मणिचीर के नाम से प्रसिद्ध थे। प्राचीन ग्रीक अभिलेखों में पैठन या प्रतिष्ठान के वस्त्रों का व बौद्ध जातकों में वाराणसीय आदि वस्त्रों का उल्लेख साड़ी की चिरकालीन निरन्तर प्राचीन परम्परा का घोत्तक है। साड़ी के रंगों का भी अपना महत्व है। साड़ी की रंग नारी की कोमल भावनाओं, सहज अनुभूतियों व सौंदर्य मूलक अवधारणाओं का बिना कुछ कहे व्यक्त कर देता है। नीली साड़ी अभिसारिका नारी साड़ी अभिसारिका नायिका अपने प्रियतम से रात्रि के अन्धकार में मिलने जाने के समय पहनती थी तो लाल रंग उसके विवाह का, मंगल का, उमंग का घोतक रहा है। पीला रंग वसन्त की भाँति नव सृजन का प्रतीक है। इसलिए प्राय मांगलिक कार्यों में अथवा पुत्र वगैरह पर पीली ही साड़ी का प्रचलन है। सफेर रंग सुचिता एवं पवित्रता का प्रतीक है तो काला रंग सदैव से दुःख व शोक को प्रकट करता रहा है। अतः साड़ी की परम्परा मन और संस्कारों से भारतीय सौंदर्य बोध की आत्मा बनी हुई है। भले ही क्षणिक सुविधाओं क लिए आप अन्य कुछ पहनें परन्तु सार्वजनिक स्थलों एवं सांस्कृतिक उत्सवों में साड़ी की बहार को बनायें रखें। साड़ी की परम्परा को बचाना अपने गौरव की दीप्ति को बचाना है। साड़ी पहनने, संवारने सजाने का अलग ही सलीका और उसके प्रखर मस्तिष्क का बोध कराता है। संपूर्ण शरीर को भाग एक ही जिस वस्त्र को आर्यिकाओं ने भी अपनाया है वह साड़ी ही है। अतः जैन महिलाओं के लिए तो संसार मार्ग अथवा वैराग्य मार्ग दोनों में ही साड़ी का कदम-कदम पर प्रावधान है वो भले ही पूजा हो पंचकल्याणक हो, विधान हो और अन्य कोई उत्सव। अतः हमें सतत साड़ी की परम्परा को हृदय से अपनाकर इसका सांस्कृतिक गौरव अक्षुण रखना है।