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कहानियां अपने युग और परिवेश की पहचान होती हैं। ऐसी कहानियां जो आपको कुछ सोचने को मजबूर करें, जो आपकी अंतरात्मा को झकझोर दें, जो आपको अपने वातावरण के रंग से सराबोर कर दें, ऐसी कहानियां किसे अच्छी नहीं लगती? ये हमारी भावनाओं और दैनिक जीवन का सच्चा इतिहास होती हैं। ऐसा इतिहास जिसमें केवल पात्र और परिचय बदल जाते हैं। यह कहानी चाहे लखनपुर की हो या लंदन की या नासिक की या फिर न्यूयार्क की। वही कहानी सर्वप्रिय है जो आपके दिल को छू जाती है। बोलो जी के कहानी स्तंभ के लिये हिन्दी के सभी पाठकों, लेखकों और पढने लिखने के शौकीन लोगों से मौलिक कहानियां आमंत्रित हैं।
अनुवाद-कर्म राष्ट्रसेवा का कर्म है। यह अनुवादक ही है जो दो संस्कृतियों, राज्यों, देशों एवं विचारधाराओं के बीच 'सेतु` का काम करता है। और तो और यह अनुवादक ही है जो भौगोलिक सीमाओं को लांघकर भाषाओं के बीच सौहाद, सौमनस्य एवं सद्भाव को स्थापित करता है तथा हमें एकात्माकता एवं वैश्वीकरण की भावनाओं से ओतप्रोत कर देता है। इस दृष्टि से यदि अनुवादक को समन्वयक, मध्यस्थ, संवाहक, भाषायी-दूत आदि की संज्ञा दी जाए तो कोई अत्युक्ति न होगी। कविवर बच्चन जी, जो स्वयं एक कुशल अनुवादक रहे हैं, ने ठीक ही कहा है कि अनुवाद दो भाषाओं के बीच मैत्री का पुल है। वे कहते हैं- ''अनुवाद एक भाषा का दूसरी भाषा की ओर बढ़ाया गया मैत्री का हाथ है। वह जितनी बार और जितनी दिशाओं में बढ़ाया जा सके, बढ़ाया जाना चाहिए- (साहित्यानुवाद: संवाद और संवेदना, डा० आरसू पृ० ८५) भाषा के आविष्कार के बाद जब मनुष्य-समाज का विकास -विस्तार होता चला गया और सम्पर्कों एवं आदान-प्रदान की प्रक्रिया को अधिक फैलाने की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी, तो अनुवाद ने जन्म लिया । प्रारम्भ में अनुवाद की परंपरा निश्चित रूप से मौखिक ही रही होगी । इतिहास साक्षी है कि प्राचीनकाल में जब एक राजा दूसरे राजा पर आक्रमण करने को निकलता था, तब अपने साथ ऐसे लोगों को भी साथ लेकर चलता था जो दुभाषिए का काम करते थे । यह अनुवाद का आदिम रूप था ।
साहित्यिक-गतिविधि के रूप में अनुवाद को बहुत बाद में महत्त्व मिला । दरअसल, अनुवाद के शलाका-पुरुष वे यात्री रहे हैं, जिन्होंने देशाटन के निमित्त विभिन्न देशों की यात्राऍं कीं और जहां-जहां वे गये, वहां-वहांकी भाषाएं सीखकर उन्होंने वहॉं के श्रेष्ठ ग्रंथों का अपनी-अपनी भाषाओं में अनुवाद किया । चौथी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में फाहियान नामक एक चीनी यात्री ने २५ वर्षों तक भारत में रहकर संस्कृत भाषा, व्याकरण, साहित्य, इतिहास, दर्शनशास्त्र आदि का अध्ययन किया और अनेक ग्रंथों की प्रतिलिपियां तैयार कीं । चीन लौटकर उसने इनमें से कई ग्रंथों का चीनी में अनुवाद किया । कहा जाता है कि चीन में अनुवादकार्य को राज्य द्वारा प्रश्रय दिया जाता था तथा पूर्ण धार्मिक विधि-विधान के साथ अनुवाद किया जाता था । संस्कृत के चीनी अनुवाद जापान में छठी-सातवीं शताब्दी में पहुंचे और जापानी में भी उनका अनुवाद हुआ ।
प्राचीनकाल से लेकर अब तक अनुवाद ने कई मंजिलें तय की हैं । यह सच है कि आधुनिककाल में अनुवाद को जो गति मिली है, वह अभूतपूर्व है । मगर, यह भी उतना ही सत्य है कि अनुवाद की आवश्यकता हर युग में, हर काल में तथा हर स्थान पर अनुभव की जाती रही है। विश्व में द्रुतगति से हो रहे विज्ञान और तकनॉलजी तथा साहित्य, धर्म-दर्शन, अर्थशास्त्र आदि ज्ञान-विज्ञानों में विकास ने अनुवाद की आश्वयकता को बहुत अधिक बढ़ावा दिया है ।