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utkarshut
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परिवार का पेट पालने के लिए वह रोजाना गांव-गांव, शहर-शहर जाकर गली-मोहल्ले घूम-घूमकर टोपियां बेचता था और उसमें बचे मुनाफे से अपना जीवनयापन करता था। बड मुश्किल से वह अपनी क चला रहा था। एक दिन उसका स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था्। पेट की वजह से उसे रात को ठीक से नींद नहीं आई थी। फिर भी वह भारी मन से उठा और अपने साथ टोपियों की गठरी और एक छोटी-सी पोटली में खाना लेकर वह शहर की ओर निकल प रोजाना की तरह वह जंगल के रास्ते से होकर शहर की ओर जा रहा था, कि रास्ते में उसे जोरों की भूख लगी। वह एक घनी छायावाले क के नीचे बैठा। पोटली खोली और खाना खाया। रात भर ठीक से न सो पाने के कारण उसका मन थेट देर सुस्ताने का हुआ। यह विचार मन में आते ही उसने अपना गमचा बिछाया और उसके पास टोपियों की गठरी रखकर वह आराम करने लगा। थोड़ी ही देर में उसे नींद लग गई।