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manishlal72
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सामान्यतया आर्त, जरूरतमन्द बुद्धिमान तथा जिज्ञासु लोग, जिन्होंने कुछ पुण्यकर्म किये हैं, भगवान् की पूजा करते हैं या पूजा करना प्रारम्भ करते हैं। अन्य लोग, जो दुष्कर्म से ही फूलते-फलते हैं, चाहे वे जिस स्तर के हों, माया द्वारा भ्रमित होने के कारण भगवान् के पास फटकते भी नहीं। अतएव पुण्यात्मा के लिए विपत्ति आने पर भगवान् के चरणकमलों में शरण लेने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचता। भगवान् के चरणकमलों का निरन्तर स्मरण करना जन्म-मृत्यु से छूटने की तायारी करना है। अतः भले ही तथाकथित विपदाएँ आे, उनका स्वागत करना होगा, क्योंकि वे भगवान् के स्मरण का अवसर प्रदान करती हैं जिसका अर्थ है मुक्ति।
जितेन्द्र कुमार नामदेव
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