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AshokSaxena
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वर्तमान समय में विश्व का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है। सोवियत संघ के भंग होने से शक्ति संतुलन अमेरिका के पक्ष में चला गया है और विश्व राजनीति में दो गुटों का जो अस्तित्व क्रमशः अमेरिका अपने उद्देश्य में सफल रहा है तथा अब विश्व की महाशक्ति के रूप में अमेरिका का वर्चस्व कायम हो गया है। सोवियत रूस आर्थिक मोर्चे पर संकटग्रस्त होने के कारण अमेरिकी धींगापुस्ती का पुरजोर विरोध करने की स्थिति में नहीं है। पचास के दशक में जब अमेरिका और सोवियत संघ दो गुटों के रूप में उभरे थे तब विश्व के कुछ देशों यथा-इंग्लैण्ड, फ्रांस, कनाडा, जर्मनी आदि का झुकाव अमेरिका की ओर था तो अनेक यूरोपीय देशों एवं अरब देशों का झुकाव रूस की ओर था, इस प्रकार सारा विश्व दो गुटों में विभक्त था। ऐसे समय में गुट निरपेक्ष आन्दोलन का प्रारम्भ भारत, मिस्त्र एवं यूगोस्वालिया ने मिलकर किया। नेहरू, हुसैन एवं टीटो ने मिलकर गुट निरपक्षता का सिद्धान्त स्वीकारते थे। प्रारम्भ में इसके सदस्य देशों की संख्या कम थी पर कालान्तर में यह संख्या बढ़कर सौ के आस-पास पहुँच गई।
गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, भारन ने दोनों गुटों के बीच जारी शीत युद्ध को समाप्त करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। हम सदा से ही विश्वशान्ति के पक्षधर रहे हैं। भारत ने प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू को सारी दुनिया अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में शान्ति दूत के रूप में ही पहचानती थी।।।