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user1170513
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सहसा मैं काफी गम्भीर हो गया था। जैसा कि उस व्यक्ति को हो जाना चाहिए, जिस पर एक भारी दायित्व आ गया हो। वह सामने खड़ा था और आँखों को बुरी तरह मल रहा था। बारह-तेरह वर्ष की उम्र ठिगना चकइठ शरीर, गोरा रंग और चपटा मुँह। वह सफेद नेकर, आधी बाँह की ही सफेद कमीज और भूरे रंग का पुराना जूता पहने था। उसके गले में स्काउटों की तरह एक रुमाल बँधा था। उसके घेरकर परिवार के अन्य़ लोग खड़े थे। निर्मला चमकती दृष्टि से कभी लड़के को देखती और कभी मुझको और अपने भाई को । निश्चय ही वह पंच-बराबर हो गयी थी। उसको लेकर मेरे साले साहब आये थे। नौकर रखना कई कारणों से बहुत जरुरी हो गया था। मेरे कभी भाई और रिश्तेदार अच्छे ओदहों पर थे और उन सभी के यहाँ नौकर थे। मैं जब बहन की शीदी में घर गया तो वहाँ नौकरों का सुख देखा। मेरी दोनों भाभियाँ रानी की तरह बैठकर चारपाइयाँ तोड़ती थींं, जबकि निर्मला को सबेरे से लेकर रात तक खटना पड़ता था। मैं ईर्ष्या से जल गया।