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singhshyam
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स्वामी परमहंस किसी गांव में भजन के लिए जा रहे थे। वह गांव दूर था, इसलिए बैलगाड़ी में बैठकर जा रहे थे। अच्छा तो यह होता कि तांगे या बग्घी मे जाते, लेकिन यजमान कंजूस था, या हो सकता है कि अपने हिसाब से मितव्ययी भी रहा हो, इसलिए उन्हें बैलगाड़ी का सहारा लेना पड़ा। खैर, तब परमहस की ख्याति ज्यादा नहीं फैली थी। लोग उन्हें काली मंदिर के पुजारी या ज्यादा से ज्यादा एक मामूली संत ही समझते थे। गाड़ीवान भी उन्हें ज्यादा नहीं जानता था। इसलिए वह रामकृष्ण से हंसी-मजाक करता जा रहा था। परमरंस के मन में एक प्रेरणा उठी और वह श्रीकृष्ण चरित सुनाने लगे। जहां जाना था, वह जगह काफी दूर थी, इसलिए गाड़ीवान का मन भी कथा में लगने लगा। उसे इतना रस आया कि कथा सुनने में ही रम गया। गाड़ीवान का ध्यान बैलों की ओर तब गया, जब वे धीमे चलने लगे।