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Krishan5659
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सोच बदलने का समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर न केवल बेलगाम गौ रक्षकों को निशाने पर लिया, बल्कि दलित उत्पीड़न की घटनाओं पर भी दो टूक ढंग से अपने विचार व्यक्त किए। दलित उत्पीड़न की हाल की घटनाएं चिंतित करने वाली हैं। लगभग सभी राजनीतिक दलों ने इन घटनाओं पर चिंता जताई, लेकिन ज्यादातर नेताओं के चिंता के स्वर में ईमानदारी का अभाव दिखा। इन नेताओं ने ऊना की घटना को लेकर तो भाजपा और केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा किया, लेकिन दलित उत्पीड़न की अन्य घटनाओं पर मौन साधे रहना ही उचित समझा। दलित उत्पीड़न की घटनाओं के मामले में यह दोहरा रवैया भी समस्याएं पैदा करने वाला है। राजनीतिक दल अपने नंबर बढ़ाने के फेर में कुछ मसलों पर तो शोर मचाते हैं और कुछ पर चुप्पी साधे रहते हैं। आम तौर पर हर वर्ष एक या दो बार दलित उत्पीड़न की घटनाओं को लेकर संसद में चर्चा होती है। पिछले दिनों भी हुई। इन चर्चाओं का कोई मूल्य-महत्व इसलिए नहीं रहता, क्योंकि राजनीतिक दल एकजुट होकर अपनी चिंता जाहिर करने से भी बचते हैं और उन कारणों की पहचान एवं उनका निवारण करने से भी जिनके चलते दलित उत्पीड़न की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। यदि राजनीतिक दल दलितों के मान-सम्मान की रक्षा के लिए सचमुच प्रतिबद्ध हैं तो फिर दलितों के प्रति मानसिकता में बदलाव लाने का काम सबसे पहले उन्हें अपने दल के स्तर पर शुरू करना चाहिए। दुर्भाग्य से इस मामले में केवल कोरी बातें ही अधिक की जाती हैं। बेहतर होगा कि भाजपा दलितों को मान-सम्मान दिलाना अपने राजनीतिक एजेंडे में न केवल शामिल करे