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MohitRana1155289
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दीवाली की रात थी। सारे मुहल्ले में रंग-बिरंगी बत्तियां जल रही थीं। मैं अपनी छत पर खडा देख रहा था। वह नजारा मेरे मन को मुग्ध कर रहा था। सामने वाला घर तेल के दीयों और मोमबत्तियों के उजालों से जगमगा रहा था। उसके छज्जे पर खडा लडका एक के बाद एक पटाखे छोडता जा रहा था। उसने अनार जलाया, जिससे रंग-बिरंगा फव्वारा फूट पडा। फिर एक रॉकेट छोडा। वह आवाज करता हुआ ऊपर उड गया। वह बहुत ऊपर जाकर आकाश में फटा तो उसमें से रंग-बिरंगे तारे निकलकर चारों ओर फैल गए। मैं भी रॉकेट छोडना चाहता था। मैं भी अनार जलाना चाहता था और चमकती हुई फुलझडी को हाथ में लेने को बेहद उत्सुक था। मैं ललचाए मन से उसकी ओर देख रहा था कि उसने मुझे अपनी ओर घूरते हुए देख लिया। उसके पूछने पर की क्या मैं भी पटाखे चलाना चाहता हूं, मैंने हामी भर दी। उसने एक पुराने कागज में कुछ लपेटा और मेरी ओर फेंक दिया। उसमें कई तरह के पटाखे और एक माचिस की डिब्बी थी। मैंने एक के बाद एक पटाखे छोडने शुरू कर दिए। बडा मजा आ रहा था। मैंने उससे उसका नाम पूछा। उसने कहा 'अशरफ'। मैंने कहा 'मेरा नाम रघु है,' और इस तरह अशरफ और मैं दोस्त बन गए। हम पडोसी थे। आमने-सामने के घरों में रहते थे। बस बीच में एक गली थी। न जाने क्यों, हमारे माता-पिता कभी आपस में नहीं मिलते थे। शायद एक-दूसरे को जानते भी न हों। लेकिन हमारी दोस्ती दिन पर दिन गहरी होती जा रही थी। दोपहर को जब दोनों घरों में माता-पिता आराम करते, हम दोनों गुल्ली-डंडा, कंचे खेल रहे होते। यह हमारा रोज का नियम बन गया था। मुझे मिठाई बहुत पसन्द थी। जब ईद आयी तो अशरफ ने बताया कि उसकी अम्मी बहुत स्वादिष्ट सेंवई बनाती हैं। सेंवई में डाले गये मेवे जैसे कि पिस्ता, बादाम, काजू और किशमिश की बात सुनकर उसके मुंह में खूब सारा पानी भर आया। 'तुम सेंवई खाने अवश्य आना,' उसने मुझे न्योता दिया। 'अम्मा आने नहीं देगी,' मैंने कहा। 'अपनी अम्मा को मत बताना बस'। मैं मान गया। ईद के दिन नया रेशमी कुरता पायजामा और कसीदा कढी हुई टोपी पहन कर अशरफ चमक रहा था। ये दोनों चीजें अब्बा कश्मीर से आज के दिन पहनने के लिए ही लाए थे। वह अपनी सजधज मुझे दिखाने के लिए बेचैन था। दोपहर में घंटी बजते ही अशरफ ने लपक कर दरवाजा खोला। अशरफ की अम्मी रसोई में अपनी सहेलियों के साथ व्यस्त थीं। उनकी एक सहेली के पूछने पर कि कौन है, उसने तपाक से उत्तर दिया, 'रघु। वही रघु जो हमारे घर के सामने रहता है'। 'अच्छा उन सामने वालों का लडका है। लेकिन हमारा उनसे क्या वास्ता। उसे कहो कि वह चला जाये', अम्मी की सहेली ने कहा। अशरफ ने पूछने पर कि क्यों, उन्होंने कहा 'बहस मत करो।' इससे पहले कि अशरफ कुछ कहता, मैं मुडकर आगे बढ गया। अम्मी की पुकार को अनसुनी करते हुए अशरफ मेरे पीछे दौडा। 'सुनो, मैं तुम्हारे लिए सेंवई ला रहा हूं।'