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आज कोई भी इस ऐतिहासिक तथ्य को झुठला नहीं सकता कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू के गलत निर्णयों के वजह से ही कश्मीर समस्या ने जन्म लिया। जब ब्रिटिश सरकार ने हिन्दुस्तान को आजाद करने के लिए भारतीय स्वतंत्रता अधितनियम 1947 पारित किया, तो उसमें हिन्दुस्तान की उन रियासतों को भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित होने अथवा स्वतंत्र रहने का अधिकार दिया, जिन पर राजा-महाराजाओं का शासन था। परिणामस्वरूप उस समय जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने से इनकार कर दिया और घोषणा की कि वह स्वतंत्र रहकर दोनों देशों- पाकिस्तान और हिन्दुस्तान से समझौता करेंगे। 14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान बनने की घोषणा की गई और 15 अगस्त, 1947को भारत स्वतंत्र हो गया।
पाकिस्तानी शासकों ने तभी से महाराजा हरि सिंह को जम्मू-कश्मीर का विलय पाकिस्तान में करने के लिए बहुत मजबूर किया, लेकिन जब वे इसके लिए तैयार न हुए, तो उन्होंन पहले तो जम्मू-कश्मीर की आर्थिक नाकेबन्दी की और फिर 22 अक्टूबर, 1947 को कबालियों की आड़ में राज्य पर अचानक हमला कर दिया। जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान हमले के दो दिन बाद ही 24 अक्टूबर, 1947 को महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मिर के बिना शर्त भारत में विलय की घोषणा कर दी और भारत से सैनिक सहायता माँगी, लेकिन उस समय चूँकि भारत की कोई वायुसेना नहीं थी, तत्कालीन नेहरू सरकार द्वारा प्राइवेट हवाई सेवाओं के जहाजों से कश्मीर की सेना भेजी गई। ऐसा करने में भारतीय सेना की कश्मीर पहुँचने की व्यवस्था में 3 दिन लग गए तथा परिणाम यह हुआ कि इन पाँच दिनों में पाकिस्तानी फौजों को राज्य में बहुत हद तक तबाही मचाने का अवसर मिल गया।
महाराजा हरि सिंह के विलय प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने के बाद 27 अक्टूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर कानूनी दृष्टि से भारत का अंग बन गया था। लेकिन नेहरू सरकार ने फिर भी यह आश्वासन दे डाला कि शान्ति स्थापना होने पर राज्य के लोगों की भारत या पाक में मिलने की इच्छा का पता लगाया जाएगा। यदि आज के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नेहरू सरकार की हिमालय जैसा एक विशाल भूल थी।