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ankur1139026
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जब कोई व्यक्ति मूर्खता या बुद्धिमत्ता से किसी काम को सम्पन्न करने के लिए मौत के मुंह में जाने को तैयार हो तो फिर वह कुछ भी कर सकता है। जान बूझकर मौत का खतरा उठाने का निश्चय व्यक्ति के दृढ़ संकल्प को व्यक्त करता है। जिसके मन से मौत का डर निकल गया वह अकेला ही संसार से संघर्ष करने को तत्पर हो जाता है! जब किसी को जान बूझकर यह ज्ञात हो जाये कि किसी चीज को किसी काले घने जंगल में जाकर लाना तो शायद ही वह वहाँ जाये। गीता में कहा गया कि व्यक्ति को अपना कर्म करना चाहिए। उसको परिणाम की चिन्ता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि फल तो परमात्मा के अधीन है। मन में दृढ़ निश्चय करके अपने कर्म की ओर अग्रसर हो जाना ही हमारे हाथ में है, उस फल क्या होगा हमें इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि फल तो परमात्मा के हाथ में है। उस व्यक्ति को छोटा भाई रोता है और उसके रोने का तात्पर्य है कि उसकी मौत (व्यक्ति) की मौत उसे जंगल में बुला रही है। लेकिन जब दृढ़ निश्चय कर लिया तो डरना सही नहीं होता है। यही सोचकर वह अपने भाई या अन्य किसी साथी के साथ में उस जंगल में चला जाता है और उसे जो प्राप्त करना होता है, वह पाकर ही लौटता है। अर्थात् दृढ़ निश्चय से कठिन से कठिन कार्य भी सम्भव है।