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ankur1139026
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रात को पिछले दरवाज़े से निकलने का आदी था वह। आहट बचाकर चलने वाला प्रेमी। बाहर जाकर इश्क़ पर फ़रमान जारी करवाता और अन्दर महबूब के क़दमों पे लेट जाता था। एक दिन उसके हाथों से महबूब का हाथ छूट गया। नाराज़ होकर बोली, हुज़ूर की ख़िदमत भी करते हो और ख़ातिरदारी से डरते हो। चलो मैं तुमको अपना बनाकर दुनिया को बता देती हूँ।
उसने अपनी आहटों को फिर छुपाने की कोशिश की। गुदगुदी से फटने लगा। बोल उठा, मोहब्बत का दस्तूर अजब है। क़ायल आपकी आँखों का हुआ और घायल आपकी आदतों से। कर दीजिए ऐलान।
सरकार बाहर आकर कहने लगीं, यह मेरी जानिब से आशिक़-ए-सरकार के ख़िताब से नवाज़ा जाता है।
बस नाटक के इस अन्त से कॉलेज में हंगामा हो गया। हंगामे के बहाने दोनों पर्दे के पीछे चले गए और लिपट गए। चूमने के लिए हंगामे से बेहतर वक़्त कोई नहीं होता...
रवीश कुमार की किताब इश्क में शहर होना का एक अंश