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atulshukla1186305


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्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौ पवन-कुमार बल बुधि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार चौपाई जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिहुँ लोक उजागर राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवन-सुत नामा महाबीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा हाथ बज्र ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। रामलखन सीता मन बसिया सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे लाय सजीवन लखन जियाये। श्री रघुबीर हरषि उर लाये रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं सनकादिक बह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते,कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा, राम मिलाय राज पद दीन्हा तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना, लंकेश्वर भए सब जग जाना जुग सहस्त्र जोजन पर भानू,लील्यों ताहि मधुर फल जानू प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं, जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं दुर्गम काज जगत के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते राम दुआरे तुम रखवारे ,होत आज्ञा बिनु पैसारे सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहु को डर ना आपन तेज सम्हारो आपै तीनों लोक हाँक तें काँपे भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै नासे रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा संकट ते हनुमान छुड़ावै। मनक्रम बचन ध्यान जो लावै सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।अस बर दीन जानकी माता राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई और देवता चित धरई। हनुमत सेई सर्ब सुख करई संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलवीरा जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरु देव की नाई जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहिं बंदि महा सुख होई जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा होय सिद्धि साखी गौरीसा, तुलसीदास सदा हरि चेरा।कीजै नाथ हृदय महँ डेरा दोहा पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप रामलखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप सियावर रामचन्द्र की जय आरती- आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की जाके बल से गिरिवर कांपै। रोग-दोष जाके निकट झांपै अंजनी पुत्र महाबलदाई। सन्तन के प्रभु सदा सहाई दे बीरा रघुनाथ पठाये। लंका जारि सिया सुधि लाये लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार लाई लंका जारि असुर संहारे, सिया रामजी के काज सँवारे लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि संजीवन प्रान उबारे पैठि पताल तोरि जम-कारे अहिरावन की भुजा उखारे बायें भुजा असुर दल मारे दहिने भुजा संतजन तारे सुर नर मुनि आरती उतारे जै जै जै हनुमान उचारे कंचन थार कपूर लौ छाई, आरती करत अंजना माई जो हनुमान जी की आरती गावै। बसि बैकुंठ परम पद पावै जय बजरंगबली।। जय सियाराम
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