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singhshyam
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जब तक हिन्दी भाषी हिन्दी को हृदय से स्वीकार नहीं करते तब तक वह राष्ट्र भाषा का स्थान नहीं पा सकती है। अक्सर यह सुनने में आता है कि हिन्दी भाषा में वैज्ञानिक साहित्य या न्यायिक साहित्य कम है या नहीं के बराबर है, यह बात बिल्कुल निराधार है। मैं इस बात को दावे के साथ कह सकता हूँ कि यदि, सरकार हिन्दी को पूर्णरुपेण सभी क्षेत्रों में ईमानदारी से लागू करें तो जो साहित्य हिन्दी भाषा में नही है, एक तो पर्याप्त साहित्य उपलब्ध है ही अगर जो साहित्य उपलब्ध नहीं है, तो वह एक साल के अन्दर अवश्य उपलब्ध हो जायेगा। इस सम्बन्ध में अक्सर यह सुनने में आता है कि हमारे यहाँ अभी स्नात्कोत्तर पढ़ाई के लिये पर्याप्त साहित्य नहीं है। बड़ी गलत बात है अभी सरकार के द्वारा ही कुछ महीने पहले यहाँ पर एक विशाल प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था उस प्रदर्शनी में जिन पुस्तकों का प्रदर्शन किया गया था उन पुस्तकों से यह बात स्पष्ट है कि हमारे यहां पर वैज्ञानिक नयायिक और शास्त्रीय विषयों पर भी हिन्दी में पर्याप्त पुस्तकें हैं।