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आजकल हमारे देश एवं प्रदेश में यह फैशन सा चल पड़ा है कि कुछ विशिष्ट लोग, दूसरों के द्वारा पहनाई गयी, सुगन्धित पुष्पों की माला को पहनने के तुरन्द बाद ही उतार देते हैं, उन्हें यह सम्मान सूचक माला ऐसी लगती है जैसे किसी ने उनके गले में काला नाग लपेट दिया हो। हमारा प्राचीन साहित्य एवं इतिहास यह स्मरण कराता है कि सुमन माला को निकालने के कारण ही देवासुर संग्राम तक छिड़ गया था जिसमें कंठहार को निकालने के अपराध में देवराज इन्द्र सिंहासन से उतार दिये गये थे।
गले में डाली गयी माला की सुगन्ध स्वाभाविक ही नाक में प्रवेश कर जाती है जिससे भीतर समाई हुई दुर्गन्ध दूर हो जाती है, मन प्रसन्न एवं प्रफुल्लित हो जाता है, रोग-दोष भाग जाते हैं। शरीर में स्वस्थ और शुभ संकल्पों का सम्यक समीकरण जाग्रत हो जाता है। गले में डाली गयी माला का अपमान करने के ही कारण भगवान शिव की सती को, अपने ही पिता दक्ष द्वारा संचालित यज्ञ में आहूति देकर अपने शरीर को नष्ट करना पड़ा था, क्योंकि उनके पिता ने ऋषि द्वारा दी गई माला का अपमान किया था।
हमारे देश में जिस तरह नई शिक्षा नीति के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक पुनर्गठन का कार्य शुरू किया गया है उसी प्रकार सोवियत संध में शिक्षण पद्धतियों के विशेषज्ञों के साथ-साथ अध्यापकगण शिक्षा की प्रक्रिया में सुधार के श्रेष्ठ तरीकों को खोजने का प्रयास कर रहे हैं। इसे स्कल में पेरेस्त्रोइका का नाम दिया जा रहा है।
डा0 राम मनोहर लोहिया जो कि अपने समय के एक महान समाजवादी नेता थे एक बार कहा था कि जिस प्रकार तवे पर रोटी बार-बार पलटने से ठीक प्रकार से पक जाती है उसी प्रकार संसदीय लोकतंत्र में व्यवस्थाओं के बदलते रहने से लोकतंत्र मजबूत होता है अतः कोई भी व्यक्ति अपना एकछत्र मनमाना शासन संचालित करने की चेष्टा नहीं करेगा।
मां वह शब्द है जिसमें बहुत से रहस्य छिपे हैं। मां शब्द एक बहुत ही महत्वपूर्ण शब्द है, जिसके कारण ही सारे संसार के महत्वपूर्ण एवं पराक्रमशाली व्यक्ति अपने जीवन में उत्कृष्ट स्थान एवं उद्देश्य को प्राप्त करने में समर्थ हो सके थे। कोई मनुष्य किसी ऊंचे पद पर तभी पहुंच सकता है जबकि उसको बचपन में सही आदर्श एवं उन्नतिशील शिक्षा प्राप्त हुई हो।