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Lokendarasingh
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यह एक सुखद संयोग ही है कि पिछले दिनों ज्योतिबा फुले की पुण्यतिथि और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की जन्मतिथि के 125 वर्ष पूरे हुए हैं। दोनों महापुरुषों ने गरीबों, दलितों और स्त्रियों की शिक्षा पर विशेष बल दिया। पर इनके आदर्शों को मानने- न मानने वालों ने शिक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है। अब सरकारी और सस्ती शिक्षा शायद ही कहीं मिलती हो । पिछले दिनों संविधान दिवस के अवसर पर संसद में राष्ट्रीय महत्व की बहसें हुईं। संविधान 26 नवंबर, 1949 को पेश किया गया था। पर उसकी उद्देशिका में जो कहा गया, वह सपना क्या था? अब असहिष्णुता बढ़ रही है। दलित मंदिरों में नहीं जा सकते। आरक्षण को आज भी प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी के रूप में नहीं अपनाया जा रहा।
कांग्रेस ने शिक्षा और रोजगार के ऐसे क्षेत्र विकसित किए, जिनसे आरक्षण का अघोषित अंत हो गया, और वही कांग्रेस के पतन का कारण भी बना। संविधान समीक्षा के नाम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित मंशा लेकर भाजपा चली थी। उसका भी हश्र कांग्रेस जैसा होगा। बिहार चुनाव का एक संदेश यह भी है कि संविधान की कल्याणकारी योजनाओं को कुचलने का हक अब किसी को नहीं दिया जाएगा। पर अंबेडकर और लोहिया के नाम पर राजनीति करने वाली मायावती और मुलायम सिंह की सरकारों ने उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा का जिस तरह सत्यानाश किया, वह तो कांग्रेस और भाजपा की दलित-विरोधी नीतियों को भी पीछे छोड़ता है।
बहुत दिनों से राष्ट्रीय दलित महिला आयोग के गठन की मांग उठ रही है। पर किसी सरकार ने इस दिशा में नहीं सोचा। ऐसे में संविधान और अंबेडकर पर चर्चा करने का मतलब नहीं है।
जो लोग कहते हैं कि संविधान में अंबेडकर का योगदान खास नहीं है, उन्हें ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ शीर्षक से प्रस्तुत उस ज्ञापन को अवश्य देखना चाहिए