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dhirendra
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कहते है कि धरती पर पहले मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्री राम अवतरित हुए तत्पश्चात प्रेम मूर्ति भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ अर्थात जीवन में पहले मर्यादा हो फिर प्रेम हो । एक बार एक आदमी जो की भगवान का अनन्य भक्त था अपने बेटी के ससुराल में गया रात हो गई तो उसे बेटी के यहां रूकना पड़ा, रात को उसकी बेटी उसके पास भोजन लेके आई ओर बोली पिताजी आप खाना खा लिजिए। पर आदमी अपनी परम्पराओ के कारण खाने से मना कर दिया उसका मानना था कि बेटी के घर का भोजन करने से उसे पाप लगेगा। अतः उसने बेटी को भोजन करने से मना कर दिया बेटी ने उसे मनाया लेकिन वह नहीं माना उसकी बेटी निराश होकर चली गई। रात हुई वह आदमी सो गया । आदमी सपना देखता है कि भगवान उसके पास में निराश बैठे हुए हैं आदमी भगवान से कारण पूछता है लेकिन भगवान कहते है कि अब रहने दो तुम ने अभी तक मुझे धोखे में ही रखा । अभी तक तो तुम कहते थे कि हे भगवान सबकुछ तेरा ही है मेरा कुछ नहीं । पर आज पता चला की वहां तेरा घर है और यहाँ तेरी बेटी का है ना मेरा वहाँ कुछ है न यहां कुछ है । आदमी को बात दिल में लग गई अचानक उठा और बेटी को बुलाया बेटी कुछ खाने को देदो । बेटी बोली पिताजी आप तो सो रहे वह बोला बेटी में सोने से पहले भी सो ही रहा था।
तात्पर्य यह है कि इन्सान इस जगत में संसारिक चीजों को अपना मानकर रहेगा तो राग होगा दूसरो का मानेगा तो द्वेश होगा और भगवान का मानकर रहेगा तो ना राग होगा ना द्वेश होगा। ओर जीवन सरल हो जाता है ।
अर्थात भक्ति में मर्यादाये टूट जाती है । सूरदास जी कहते है कि राम और कृष्ण जे दोउ जीवन के आधार सूरदास दोउ नाव चढ़ो है कोउ उतारे पार। जय हिन्द।