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AshokKumarMaurya
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नेत्रहीन एस के जयकुमार कहते हैं कि जीवन की कठिनाईयों से निपटने का सबसे बेहतर तरीका यह है कि सबसे पहले आप इसकी उपस्थिति को स्वीकार करें।
समस्याओं के बिना जीवन बिल्कुल वैसा ही होता है जैसे विरोधि टीम के बिना कोई मैच! आप विरोधि टीम के बिना खेल का अभ्यास तक नहीं कर सकते हैं। इसी प्रकार समस्याएं जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है। मान लेते हैं कि आपको एक महान विरोधि टीम के खिलाफ खेलने का मौका मिलता है, तो क्या आप इस बात पर गर्व नहीं करेंगे कि आपका प्रतिद्वंदि मजबूत है? ऐसी परिस्थितियों में आप अपने सभी स्रोतों का इस्तेमाल का इस अवसर का सबसे अच्छा उपयोग करेंगे और अपनी सभी छिपी क्षमताओं को सामने लाकर अपनी सर्वश्रेष्ठ समर्थता के साथ इस खेल को खेलेंगे।
आप जब जीवन में समस्याओं का सामना करते हैं, तो सबसे पहले उन्हें स्वीकार करें और उसे उस अवसर के रूप में देखें जो आपकी छिपी ताकतों को सामने लाएगा। अगर आप समस्या को स्वीकार लेते हैं तो इसे हल करने की ताकत का भी पता आप लगा लेंगे। तैयारी बिल्कुल वैसे ही करें जैसे आप क्रिकेट मैच में किसी विरोधि टीम का सामना करने के लिए करते हैं। खुद को सबसे पहले उन समस्याओं को स्वीकार करने के लिए तैयार करें जो आपके नियंत्रण में नहीं है। ऐसी परिस्थितियों को स्वीकार करके, आप खुद को इसे आत्मसमर्पित नहीं कर रहे हैं बल्कि इससे निपटने के लिए रास्ते का निर्माण कर रहे हैं।
एक समस्या आपको अलग-अलग तरीकों से प्रभावित कर सकता है। उदाहरण के लिए, जब किसी व्यक्ति की दृष्टि कम हो जाती है और उसे लगता है कि वो जल्द ही अंधा हो जायेगा तो यह खबर उसे दो तरीकों से प्रभावित करती है। पहले स्तर पर उसे कई व्यवहारिक चुनौतियों से निपटना होगा जैसे कि पढ़ना, लोगों को देखना, टी वी देखना। और दूसरे स्तर पर उसे इसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव से जूझना होगा। व्यवहारिक हिस्सा किसी भी व्यक्ति के ऊर्जा का केवल 25 प्रतिशत हिस्सा को खत्म करेगा जबकि मनोवैज्ञानिक पहलू बाकी बचा 75 प्रतिशत हिस्सा निगल जाता है। परिणामस्वरूप वह अधिकतर समय अपने माता-पिता और अपने भविष्य के बारे में सोचने में गुजारेगा। वह अपना ध्यान अपने काम पर, स्वादिष्ट खाना खाने पर या मधुर संगीत सुनने पर केंद्रित करने में सक्षम नहीं हो पायेगा।