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AnshulShrivastava975
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बसपा की खिसकती जमीन को बचाने के लिए पार्टी प्रमुख मायावती ने एक नया राजनीतिक दांव चला है। राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के दलित कार्ड से तिलमिलाई मायावती ने दलितों और अल्पसंख्यकों पर हमले को मुद्दा बनाकर मंगलवार को राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। अपने त्यागपत्र में उन्होंने कहा कि मैं दलित समाज से आती हूं। और जब मैं अपने समाज की बात नहीं रख सकती हूं। और जब मैं अपने समाज की बात नहीं रख सकती हूं, तो मेरे यहां होने का क्या लाभ है?
मंगलवार की सुबह विपक्ष तौयारी के साथ संसद आया था। विपक्षी सांसद बैनर के साथ मौजूद थे। कार्यवाही शुरू होते ही सरकार पर आरोपों की झड़ी लगने लगी। जवाब सरकारी पक्ष की ओर से भी आया। राज्यसभा में तब सनसनी फैली जब मायावती इस्तीफे की धमकी दे दी। सहारनपुर दंगे के बाबत उपाध्यक्ष ने उन्हें कुछ मिनटों में भाषण खत्म करने को कहा। वक्त गुजरा तो घंटी बजाकर उन्हें इसकी याद दिलाई गई। इस पर मायावती आपा खो बैठीं। उन्होंने तैश में उपसभापति पर बरसते हुए कहा, जब आप मुझे सदन में बेलने नहीं देते हैं तो मैं इस्तीफा देती हूं। उसी अंदाज में वह सदन छोड़कर चली गईं । कांग्रेस और वाम दल के सदस्यों ने भी मायावती के साथ ही सदन छोड़ दिया। इसके बाद संसदीय कार्य राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि मयावती ने उपसभापति का अपमान किया है, जिसके लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए।
बसपा प्रमुख ने इस्तीफा शाम को राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी को सौंप दिया। उन्होंने कहा कि मैं दलित उत्पीड़न की बात सदन में रखना चाहती थी। सहारनपुर गांव में दलित उत्पीड़न हुआ है, मैं उसकी बात उठाना चाहती थी। लेकिन सत्ता पक्ष के सभी लोग एक साथ खड़े हो गए और मुझे बोलने का मौका नहीं दिया गया।
बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा यूं ही नहीं दिया। दरअसल, यह उनका मास्टर स्ट्रोक है, जो विधानसभा चुनाव के बाद छितराते जा रहे दलित वोट बैंक को एकजुट करने में सफल साबित हो सकता है। दलितो में भारतीय जनता पार्टी के प्रति बढ़ता लगाव बसपा की बड़ी चुनौती है और ऐसे में उन्हें यह संदेश देना ही था कि वह अपने लोगों के हित में कोई भी कुर्बानी दे सकती हैं।
विधानसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद बसपा की बेचैनी को राष्ट्रपति चुनाव ने बढ़ा दिया। जाहिर है कि रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति बने तो दलितों के बीच पकड़ बनाए रखना बसपा के लिए आसान नहीं होगा। भाजपा को दलित विरोधी बताकर वोट बटोरने में भी मुश्किले आएगी। एक और बड़ी चिंता दलितों के बीच भीम आर्मी सरीखे संगठनों की लोकप्रियता बढ़ना भी है। सहारनपुर के शब्बीरपुर प्रकरण ने बसपा जड़ों चोट किया है। उनके इस्तीफे को दलित वोटों को लेकर बाहरी व भीतरी हमलों का जवाब माना जा रहा है।
दलित चिंतक डा वीर सिंह का कहना है कि बसपा सुप्रीमों का राज्यसभा में कार्यकाल एक वर्ष से कम रह गया है और अपने बूते फिर सदस्यता हासिल करने की संभावना भी नहीं है। ऐसे में मायावती राज्यसभा से इस्तीफा देकर दलित हित के लिए बलिदानी भूमिका को कैश करना चाहेगी।