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Daveakhilesh
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कानून के राज में यकीन करने वालों के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीस जेएस खेहर की यह टिप्पणी कि कानून तोड़ने और अदालत की अवमानना करना हमारे खून और संस्कृति में समा चुका है, गहारा आघात पहुंचाने वाली है। उनका यह सात्विक गुस्सा है और इस पर सिर्फ कानून लागू करने वाली सरकारी एजेसियों को ही नहीं इस देश के नागरिकों को भी ध्यान देना चाहिए। न्यायमूर्ति खेहर की इस चेतवनी को एक आदेश के रूप में लिया जाना चाहिए कि कानून का उल्लंघन करने वालों को सजा होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा दो मुद्दों पर है। एक तो देश में बढ़ती अराजकता और भीड़ द्वारा कानून हाथ में लिए जाने का है। दूसरा मुद्दा अदालत की अवमानना का है। अदालत अपनी अवमानना के बढ़ने की घटनाएं रसूखदार लोगों में कानून का भय कम होने और उससे बचने का रास्ता निकालने में महारत होने से पैदा हुई है। इस देश के जनप्रतिनिधि और अधिकारी चूंकि कानून बनाते और लागू करते हैं इसलिए वे खुद को कानून समझने लगते हैं। जबकि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति का नहीं कानून का राज होता है। दूसरे वे अमीन लोग हैं जो कानून लागू करने वालों को खरीद लेते हैं। अगर अदालतें सख्त हो जाएं और जैसा कि हो रही हैं और न्याय की प्रक्रिया लंबी होने की बजाय शीघ्र होने लगे तो न्यायमूर्ति खेहर की भावना का आदर होने की गुंजाइश बढ़ेगी। दूसरा मुद्दा धर्म जाति से जुड़ी घृणा व्यक्तिगत अहम ओर आर्थिक हितों के टकराब पर होने वाले उन अपराधों का है जिन्होंने सिर्फ सार्वजनिक जीवन को असुरक्षित किया है बल्कि भार की लोकतांत्रिक छवि को कलंकित किया है। यह स्थितियां सिर्फ मानवता के निरादर से पैदा होती हैं बल्कि कानून का राज कायम करने वाली संस्थाओं के प्रति कोई खौफ होने से भी बनती हैं। निश्चित तौर पर कानून का राज कायम करने के लिए उसके प्रति एक प्रकार का खौफ और आदर तो होना ही चाहिए उससे ज्यादा भारतीयता का दायित्वबोध भी होना जरूरी है। एक नागरिक होने के नाते हमें देश के कानून से प्यार भी होना चाहिए और उसे सफल बनाने के लिए अपना साथ्य तो उचित होना ही चाहिए, साधन को उससे भी ज्यादा पवित्र रखना चाहिए।