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JayhindYadav
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पहाडों में सावन तीज त्योेहार हमारी संस्कृति के साथ-साथ हमारी परंपरा भी हैं। सावन माह विवाहित बेटियों को अवसर देता है मायके आने का। पहाडों में कहते हैं विवाह के बाद पहले सावन में सास-बहु इकट्ठी नहीं रहती है अत: बेटियां मायके आती हैं जहां उन्हें अपने परिवार ही नहीं, बचपन की सहेलियों के साथ त्योहार मनाने का मौका मिलता है। अपने देश के पहाडी हिस्सों में सावन एक सा नहीं मनाया जाता।
नई नवेली दुल्हन के लिए विवाह के बाद का पहला सावन विशेष महत्व रखता है, जिसे वह अपने मायके में अपनी सखी-सहेलियों, बहनों, भाभियों के साथ मनाती हैं। तीज के लिये उसकी ससुराल से भेंट आती है, जिसे सिंधारा कहते हैं। इसमें चूडी, बिन्दी, महंदी सामर्थ्य के अनुसार गहने, कपडे, फल, मिठाई विशेष रूप से घेवर, झूला-पटरी आते हैं। पूरे सावन मायके में रहकर रक्षाबंधन के बाद बेटी अपनी ससुराल वापस चली जाती है। एक साल के बाद आने वाली तीज में बेटी तो मायके नहीं आती पर उसे सिंधारा अवश्य मिलता है जो मायके वालों की ओर से दिया जाता है। बडे चाव से ये सिंधारा भाई लेकर बहन की ससुराल जाता है। बेटियों को इसका इंतजार रहता है। हर बेटी को भेंट का नहीं, भाई और मायके की महक का इंतजार होता है।
उत्तराखण्ड में सावन को सोंढ दा महीना कहते हैं। दूर रहने वाली बेटियां भी सावन में मायके आती हैं। यहां सावन भर प्रत्येक सोमवार को आटे में गुड मिला कर रोट बनाये जाते हैं। इसी रोट का भोग भगवान शिव को लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त पहाडी भंगल (भांग) और उडद की दाल के पकोडे, हलुआ पूरी बनाई जाती है। सुहागिने व्रत रखती हैं और इन्हीं से व्रत खोलती हैं। जम्मूख मे सावन के महिने में रूट रोहडे पर्व मनाया जाता है जो अषाढ से ही आरंभ हो जाता है। आषाढ की संक्रांति को घर के बेटियां आंगन में या गमलों में चना, उडद, बाजरे, मक्के आदि के दाने बोती हैं। सावन में बेटियां जब मायके आती हैं तब तक ये बीज उग आते हैं। कहते हैं कि उन कोपलों को देखकर पता चलता है कि इस साल फसल कैसी होगी। सावन की संक्रांति को इन रहाडों को नहर या दरिया में प्रवाहित कर दिया जाता है और इसी के साथ सावन का महिना बिताने आयी बेटियां सगुन लेकर वापस ससुराल लौट जाती हैं।
हिमांचल में कहा जाता है कि सावन में तीन काम जरूर करने हैं- झूला झूलना, हाथों में महंदी लगाना, खीर और पतरोडे खाना। यहां सावन सोमवार को व्रत रखते हैं। ये व्रत स्त्रियां ही रखें ये जरूरी नहीं। पुरूष, कुवांरी कन्याएं, बूढी महिलाएं जो चाहे रख लेती हैं। शिव की पूजा की जाती है, कच्चे दूध मिले जल से स्नान कराया जाता है। बेल पत्र, भांग और खीर चढाई जाती है। घरों में खीर, पतरोडे, उडद की दाल के भल्ले, बबरू आदि बनाए जाते हैं और व्रत खोला जाता है। यहां बेटियां सावन में मायके आएं, ऐसा कोई रिवाज नहीं है। पूर्णिमा के बाद पडने वाली संक्रांति के बाद काला महिना आरंभ होता है। उस महिने में नव विवाहित बेटियों को मायके बुलाया जाता है। कहते हैं कि इस महिने में सास-बहु एक साथ नहीं रहती है। गांव देहातों में सावन के महिने में छल्लियों (भुट्टे) की गुडाई और धान की रोपाई की जाती है।