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VirendraGakre
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कितना दुखद है कि कोसी वासी आज फिर उसी तिराहे पर खड़े हैं जहां तकरीबन सत्तर साल पहले थे। तब यह बहस हुआ करती थी कि आखिर इस कोसी नदी का क्या उपाय किया जाए? क्या बराज और तटबंध के जरिए कोसी को काबू में किया जा सकता है? पता नहीं क्यों हम आज भी श्रापित हैं और मानसूल में बाढ़ का दंश हर बार झेलते हैं। आज फिर बिहार तीव्र वर्षा के दुष्प्रभाव से निपटने के लिए संघर्ष कर रहा है। बाढ़ के इस वार्षिक दुष्चक्र से हम कब तक जूझते रहेंगे? सरकार, बचाव और राहत कार्य की तैयारी में हमेशा पीछे क्यों रह जाती है? तत्काल राहत शिविर स्थापित करने, स्वास्थ्य की बुनियादी सहायता ओर सूखा राशन और दवाओं के भंडारण के प्रति सरकार गंभीर क्यों नहीं रहती और समय रहते ध्यान क्यों नहीं देती है? यह समझ से परे है। बाढ़ प्रबंधन के लिए न सिर्फ एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है, बल्कि नदियों के 'पैटर्न' की अच्छी समझ के साथ-साथ उसके बहाव की दशिा में हो रहे बदलाव पर पैनी नजर रखना भी उतना जरूरी है। बाढ़ की पूर्व सूचना के लिए सिर्फ उपग्रह या भौगोलिक सूचना प्रणाली पर निर्भर रहने के बजाय, भू-स्तरीय सर्वेक्षणों और वास्तविक घटनाओं की जमीनी रिपोर्ट का गहन प्रयोग भी आवश्यक है। कोसी के पैटर्न और बहाव की दिशा में बदलाव ने समस्या की जटिलता में वृद्धि की है और इसलिए कोसी नदी पर गहरे अनुसंधान की आवश्यकता है। इसके पूरे पैटर्न को गहराई से समझने की जरूरत है तभी हम इस पूरे क्षेत्र के लिए एक रक्षात्मक बुनियादी सुरक्षा ढांचे के निर्माण के साथ-साथ, आपातकालीन परिस्थिति में बचाव कार्य में व्यावहारिकता और कार्यकुशलता में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। कोसी नदी को हम बिहार के एक श्राप की तरह कब तक झेलते रहें? इस बार भी बिहार में भीषण बाढ़ ने जिस तरह का कहर ढाया है और दिनोंदिनों इसके और भयावह होने की आशंका है, उसने हमारे आपदा प्रबंधन तंत्र की पोल खोलकर रख दी है। आपदा प्रबंधन के संपूर्ण तंत्र और उसके क्रियान्वयन के दावों की पड़ताल यदि कोसी की विनाशलीला को ध्यान में रखकर की जाए तो इनके नौसिखिेयेपन का सारा सच सामने आ जाएगा। आपदा प्रबंधन से जुड़ा सूचना और संचार तंत्र न तो समय पर राहत कार्यों की शुरूआत करा सका है और न ही आपदा के मूल कारण के संदर्भ में त्वरित विश्लेषण ही जारी कर सका है।