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VirendraGakre
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तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला न सिंर्फ ऐतिहासिक है बल्कि यह मुस्लिम मुस्लिम महिलाओं के लिए स्वातभिमान पूर्वक जिंदगी जीने की कए शरुआत भी है। शीर्ष अदालत की पांच सदस्यीिय संविधान पीट ने तीन-दो के बहुमत से तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित कर समाज में एक नई बहस का अवसर दिया है। इस फैसले को किसी एक की जीत अथवा हार के रूप में देखने की बजाए समाज में एक नई बहस का अवसर दिया है। इस फैसले को किसी एक की जीत अथवा हार के रूप में देखने की बजाए समाज में व्याहप्ति कुरीतियों के उन्मू लन के रूप के रूप में देखने की जरूरत है। यह धर्म से जुड़ा मुद्दा नहीं है। देश ने सदियों तक बाल विवाह और सती प्रथा को देखा भी है और भुगता भी। आवाज उठी तो इन कुरीतियों के उन्मूीलन की दिशा में प्रयास किए। देश आज सती प्रथा से मुक्त हो चुका है। चोरी छिपे बाल विवाह की घटनाएं आज भी होती है लेकिन इनमें सजा का प्रावधान भी है। लम्बेप समय से विवादित तीन तलाक के खिलाफ मुस्लिम महिलाएं न सिर्फ लामबंध हुई बल्कि सर्वोच्चज अदालत तक भी पहुंचीं। लंबी बहस और तर्क-वितर्क के बाद सर्वोच्चम न्यासयालय ने फैसला सुनाया। बहुत से इस्लाामिक देश तीन तलाक प्रथा पर पहले ही रोक लगा चुके हैं। यही कारण है कि सरकार से लेकर प्रमुख राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस ने फैसले का स्वाुगत किया है। सरकार की तरफ से अल्मपसंख्य क मामलों के मंत्री मुख्तामर अब्बाकस नकवी ने सभी राजनीतिक दलों के साथ विचार-विमर्श कर कानून बनाने की बात कही है। सामाजिक बुराई के खात्मे् के लिए सभी राजनीतिक दल और धार्मिक संगठन मिलकर काई रास्ता निकाले तो समस्यानओं के समाधान के लिए अदालतों का दरबाजा खटखटाने की कोई जरूरत ही नहीं। तीन तलाक का मामला अदालती आदेश के बाद समाप्तं मान लेना चाहिए। साथ ही महिला उत्थाजन के रास्तेल में आने वाली अन्यद बाधाओं को दूर करने की दिशा में नए सिर से पहल करनी चाहिए। कोशिश रहे कि समाधान बिना गतिरोध के निकले। लैंगिक समानता के मुद्दे पर हर दल आवाज तो उठाता है असके बावजूद महिलाओं को अपने अधिकरों के लिए अब भी संघर्ष करना पड़ता है। आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस मामले पर 10 सितम्बएर को भोपाल में आगामी रणनीति पर विचार करेगा। उम्मी द की जाती है कि बोर्ड तमाम पहलुओं पर विचार के बाद दूसरे पक्षों की तरह फैसले का सम्मा न करेगा।