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Daveakhilesh
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अपीलार्थी ने कोलंबो से कांडला बंदरगाह पर परिष्कृत औद्योगिक नारियल तेल के दो परेषणों का आयात किया। वर्ष 1980-81 की आयात नीति के अनुसार, जिसके अधीन दोनों परेषणों वाले आयातित नारियल तेल का उल्लेख उस नीति के परिशिष्ट 9 की प्रविष्टि 5 के अधीन एक ऐसी सरणीबद्ध मद के रूप में किया गया है जिसका आयात राज्य व्यापार निगम के माध्यम से नहीं किया गया। उक्त माल निर्विवाद रूप से खुले समुद्र के आधार पर बेचा गया। अपीलार्थी की दलील यह थी कि नारियल का खाद्य तेल ही सरणीबद्ध मद है। सीमा-शुल्क कलेक्टर ने आयातकर्ताओं को नोटिस जारी करके हेतुक दर्शित करने की अपेक्षा की कि उक्त दोनों परेषण सीमा-शुल्क अधिनियम की धारा 111 (घ) के अधीन क्यों न जब्त कर लिए जाएं क्योंकि उक्त आयात और निर्यात (नियंत्रण) अधिनियम, 1947 की धारा 3(1) का उल्लंघन करके किया गया है। आयातकर्ताओं ने उक्त दोनों नोटिसों के विस्तृत उत्तर भेजे जिसमें यह प्रकथन किया गया कि आयात वैध और विधिमान्य है तथा हर दशा में सद्भावी हैं। सीमा-शुल्क तथा उत्पाद-शुल्क कलेक्टर ने आदेश सं0 6 और 7 पारित करके उक्त परेषणों के संबंध में क्रमश: 2 करोड़ तथा 3 करोड़ रुपए के जुर्माने का संदाय करके माल का मोचन कराने का विकल्प प्रदान करते हुए सीमा शुल्क अधिनियम की धारा 111 (घ) के अधीन उक्त दोनों परेषणों को जप्त किए जाने का आदेश दिया। अंत में यह कहा गया कि यदि आयातकर्ता माल छुड़ाने के अपने विकल्प का प्रयोग करते हैं तो वह श्री लंका से आने वाले माल को लागू अधिमानी दरों पर शुल्क का भुगतान करके माल की निकासी कर सकते हैं। इन आदेशों को दिल्ली उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 226/227 के अधीन रिट याचिका सं0 4037 और 3038 फाइल करके चुनौती दी गई तथा उनका निपटारा एक की आदेश द्वारा किया गया। उच्च न्यायालय ने बहुमत के निर्णय से उक्त रिट याचिकाएं खारिज कर दीं और आयातकर्ताओं की खारिजी के निर्णय के विरुद्ध अपील लेकर केंद्रीय उत्पाद शुल्क तथा स्वर्ण नियंत्रण अधिकरण की शरण में जाने की अनुमति दे दी। अधिकरण ने आयातकर्ताओं की अपीलें खारिज कर दीं। अधिकरण के उक्त विनिश्चय के विरुद्ध आयातकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 136 के अधीन इस न्यायालय की शरण ली। अपीलें खारिज करते हुए,
अभिनिर्धारित-मोचन जुर्माने की प्रमात्रा प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगी तथा इस संबंध में कोई निश्चित नियम अधिकथित नहीं किया जा सकता। इसलिए यह तथ्य मात्र भी कि आयातकर्ताओं ने सद्भावेन कार्य किया उन्हें यह दावा करने का हकदार नहीं बनाएगा कि सारा मोचन-जुर्माना छोड़ दिया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में भी मोचन-फीस की प्रमात्रा का नियत किया जाना मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। इसलिए यदि किसी मामले मे आयातकर्ता यह सिद्ध कर भी देते हैं कि उनकी कार्रवाई सद्भावी थी, तो ऐसा सिद्ध कर देने मात्र के आधार पर उन्हें तब तक पूरे मोचन जुर्माने की छूट का हक नहीं मिलेगा जब तक कि मामले के सभी तथ्य और परिस्थितियां ऐसी छूट दिए जाने की अपेक्षा न करते हों।