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Daveakhilesh
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अपीलार्थीगण के विद्वान् अधिवक्ता ने हमारे सम्मुख मुख्यत: यह तर्क प्रस्तुत किया कि अपीलार्थीगण-अभियुक्तगण प्रथम सूचना रिपोर्ट में नामजद नहीं हैं। अभियोजन पक्ष द्वारा दिखाई गई बरामदगी गलत एवं फर्जी है। अपीलार्थी राम अवतार द्वारा विवेचनाधिकारी को घटना में प्रयुक्त काई भी ईंट बरामद नहीं कराई गई। विवेचनाधिकारी ने गलत कहानी बनाकर फर्जी ढंग से ईंट की बरामदगी दिखाई है। अपीलार्थी अरविन्द से कोई बरामदगी नहीं बताई जाती है। यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया कि मात्र डाग स्कवायड के आधार पर अपीलार्थीगण की संलिप्तता सिद्ध नहीं होती है। पुलिस द्वारा मौके पर डाग स्कवायड मंगाया गया था। जिससे स्पष्ट होता है कि हमलावर अज्ञात थे तथा किसी ने घटना होते नहीं देखी थी। अभियोजन साक्षी सं. 1 अशरफी तथा अभियोजन साक्षी सं. 2 दीपक के साक्ष्य विश्वसनीय नहीं हैं। उपरोक्त दोनों साक्षियों की साक्ष्य से कथित अपराध में अपीलार्थीगण की संलिप्तता सिद्ध नहीं होती है। विवेचनाधिकारी ने अभियोजन साक्षी सं. 1 अशरफी का बयान काफी विलंब से दिनांक 12 सितंबर, 2009 को अंकित किया है तथा अभियोजन साक्षी सं. 2 दीपक ने अपने बयान अंतर्गत धारा 161 दंड प्रक्रिया संहिता में अपीलार्थीगण के नाम का उल्लेख नहीं किया है। यदि अपीलार्थीगण द्वारा कथित घटना कारित की गई होती तो अभियोजन साक्षी सं. 1 अशरुी तथा अभियोजन साक्षी सं. 2 दीपक उनका नाम पुलिस के समक्ष तुरन्त लेते लेकिन अभियोजन साक्षी सं. 2 दीपक ने अपने बयान अंतर्गत धारा 161 दंड प्रक्रिया संहिता में अपीलार्थीगण के नाम का कोई उल्लेख नहीं किया है। यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया कि प्रस्तुत मामले में अपीलार्थीगण को महज रंजिशन झूंठा फंसाया गया है। अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत की गई सक्ष्य से अपीलार्थीगण के विरुद्ध लगाए गए अारोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हैं। विद्धान अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा साक्ष्य का सम्यक् परिशीलन नहीं किया गया। ऐसी दशा में विद्वान् अपन जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा साक्ष्य का सम्यक् परिशीलन नहीं किया गया। ऐसी दशा में विद्वान् अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 18-19 नवंबर, 2011 अपास्त किए जाने योग्य है तथा अपीलार्थीगण दोषमुक्त किए जाने योग्य हैं।