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VirendraGakre
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एक सेठ था। भरी जवानी में उसकी पत्नी मर गई। बस एक पुत्र था, सौतेली मां उसे दुख ना दे इसलिए उसने दूसरी शादी नहीं की। पुत्र के जवान होते ही उसने उसकी शादी कर दी। बाप-बेटे एक ही दुकान पर बैठते थे। दुकान मानो घर का दरवाजा ही थी। बाप-बेटा बारी-बारी से खाना खाने जाया करते थे। पहले पिता खाना खाने जाया करता था और फिर बेटा। दुकान अच्छी खासी चल रही थी। किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। बाप भी अपने बेटे बहू के साथ हंसी-खुशी जीवन बिता रहा था। एक दिन जब सेठ भोजन कर रहा था, तो उसे दही की कटोरी नजर नहीं आई, जो प्रत्येक दिन उसके भोजन का हिस्सा हुआ करती थी। सेठ ने अपनी बहू को कहा तो बहू ने दही ना जमने की बात कही। सेठ खाना खाकर अपनी दुकान पर लौट आया। अब सेठ का पुत्र भोजन करने घर के अंदर गया। कुछ देर बाद सेठ भी घर के अंदर गया, क्योंकि तिजोरी की चाबी सेठ का बेटा अपने जेब में ही रख चला आया था। सेठ ने देखा कि बेटा बड़े प्रेम से अपनी पत्नी के साथ परिहास करते हुए दही खा रहा है। सेठ तिजोरी की चाबी लेकर वापस अपनी दुकान पर आ गया। लेकिन सेठ का मन अब दुकान पर नहीं लग रहा था। वो खोया-खोया सा रहने लगा और एक दिन घर से निकल गया। लगभग 10 साल बाद सेठ अपने घर वापस आया। उसके साथ अब उसकी पत्नी व दो बच्चे भी थे। घर लौट आने की खुशी में दोस्तों-परिचितों का समागम रखा गया। सेठ के मित्रों व कुटुम्बजनों ने उससे अब जाकर दूसरी शादी के बारे में पूछा तो उसने उसका कारण वो एक कटोरी दही बताया जो उसकी बहू नें उसे न खिला कर अपने पति को खिलाया था।