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LalitSingh1423184


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्रदुषण एवं पर्यावरण आपस में एक विचित्र संबंध रखते हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक अवश्‍य ही नहीं हैं, ही एक-दूसरे के समान्‍तर हैं अपितु ये दोनों एक-दूसरे के कारक हैं। इन दोनों के बीच में खड़ा है मानव ! प्रदूषण के निवारण हेतु पर्यावरण स्‍वयं सक्षम। साथ ही पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने हेतु प्रदूषण हेतु प्रदूषण भी परिपूर्ण है, परन्‍तु दानों के ये काम मानव सहयोग से और भी सरल हो सकते हैं। अब यह मानव पर निर्भर है कि वह किसका साथ दें ? जो चीज हमें सहज प्राप्‍त होती है, उसका मोल हम नहीं जान सकते उसका महत्‍त्‍व नहीं पहचान सकते पर्यावरण हमारे लिए प्रकृति की देन है। यह मानव जीवन के विकास के लिए अत्‍यन्‍त आवश्‍यक है। इसलिए इसका रक्षण हमारा प्रथम कर्त्‍तव्‍य है। चूंकि यह सहज प्राप्‍य है अत: हम इसके प्रति कुछ हद तक उदासीन रहे हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि मानव अपने विकास की धुन में प्रदूषण और पर्यावरण दोनों के प्रति उदासीन रहा है। मानव की इस उसावधानी का परिणाम यह रहा है कि प्रदूषण जो मानव के विनाश का प्रमुख कारण बनता जा रहा है और पर्यावरण भी संकट की स्थिति में है। मानव जाति की उत्‍पत्ति से लेकर विकास तक एक चीज सदैव उसके साथ-साथ रही है और वो है पर्यावरण पर्यावरण धरती की हरियाली, स्‍वच्‍छ निर्मल जल और ताजी हवा इसके सुन्‍दर मेल का ही दूसरा नाम है धरती की हरियाली वनों से कायम रहती है, यही हरियाली धरती की शोभा है। जैसे धरती ने अपने सौन्‍दर्य की वृद्धि के लिए कोई चादर अपने ऊपर बदन पर ओढ़ ली हो। नदियों के रूप में बहता पानी जैसे रगों में दौडते खून के समान है, जो धरती का प्रतीक है धरती ने अपनी यह धराेहर अपने लाडलों के लिए संजाेकर रखी है। धरती का यह लाडला मानव है। वैसे मानव के साथ-साथ धरती की गोद में असंख्‍य जीव-जन्‍तु भी पलते है। जो यथाशक्त्‍िा धरती तथा पर्यावरण के प्रति अपने-अपने कर्त्‍तव्‍यों का निर्वाह करते हैं, परन्‍तु मानव जो स्‍वयं को धरती का लाडला मानता है, स्‍वयं ही कर्त्‍तव्‍यों से विमुख होता जा रहा है।
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