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SankitChoudhary


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मेरा निश्चित मत है कि अाज की अंग्रेजी शिक्षा ने शिक्षित भारतीयों को निर्बल और शक्तिहीन बना दिया है। इसने भारतीय छात्रों की शक्ति पर भारी बोझ डाला है। हमें नकलची बना दिया गया है। देशी भाषाओं को अपनी जगह से हटाकर अंग्रेजी को बिठाने की प्रक्रिया अंग्रेजों के साथ हमारे संबंधों का सबसे दुखद प्रकरण है। राजा राममोहन राय ज्‍यादा बड़े सुधारक होते और लोकमान्‍य तिलक ज्‍यादा बड़े विद्धान बने होते, यदि उन्‍हें अंग्रे‍जी में सोचने और अपने विचारों को दूसरों तक मुख्‍यत: अंग्रेजी में पहुँचाने की कठिनाई से आरम्‍भ न‍हीं करना पडता। यदि वे थोड़ी कम स्‍वाभाविक पद्धति में पढ़-लिखकर बड़े होते, तो अपने लोगों पर उनका असर, जो कि अद्भुत था, और भी ज्‍यादा हुआ होता इसमें कोई शक नहीं कि अंग्रेजी साहित्‍य के समृद्ध भण्‍डार का ज्ञान प्राप्‍त करने से इन दोनों को लाभ हुआ। लेकिन भण्‍डार तक उनकी पहुँच अपनी मात्र-भाषाओं के माध्‍यम से होनी चाहिए थी। कोई भी देश नकलचियों जाति पैदा करके राष्‍ट्र नहीं बन सकता। जरा कल्‍पना कीजिए कि यदि अंग्रेजी के पास बाईबल का अपना प्रमाणभूत संस्‍करण होता तो उनका क्‍या हाल होता? मेरा विश्‍वास है कि भारतीय संत आधुनिक विद्धानों की अपेक्षा अधिक बड़े पुरूष थे। मैं जानता हूँ कि तुलना करना अच्‍छा नहीं है। अपने-अपने ढ़ग से सभी समान रूप से बड़े हैं। यदि फल की दृष्टि से देखें तो जनता पर आधुनिक विद्धानों का असर उतना स्‍थायी और दूरगामी नहीं है जितना कि संतो का है। अंग्रेजी सीखने के लिए हमारा विचारहीन मोह है उससे खुद मुक्‍त होकर और समाज को मुक्‍त करके इस भारतीय जनता की एक बड़ी से बड़ी सेवा कर सकते हैं अंग्रेजी भाषा हमारी शालाओं, विद्यालयों में श्‍ािक्षा का माध्‍यम हो गई है हमारे देश की राष्‍ट्रभाषा हुई जा रही है। विचार उसी में प्रकट होते हैं। अंग्रेजी के ज्ञान की आवश्‍यकता के विश्‍वास ने हमें गुलाम बना दिया है।
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