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KuldeepKhare
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आचरण ही मानव काे उच्च शिखर पर पहुंचाता है और अधोगामी कराने में भी वही सहायक होता है। आचरण ही मानव को स्वस्थ, सबल और पुरूषार्थी बनाता है। आचरण ही मनुष्य को श्रीहीन, जर्जर और अस्वस्थ बनाता है। इस प्रतिकूलता का कारण क्या है? यह है आचरण के रूप एक सौम्य, दूसरा असौम्य। एक सुन्दर, दूसरा असुन्दर, एक सदाचरण, दूसरा दुराचरण है।
मानव अगर सदाचारी होता है तो वह उन्नति की चरम सीमा को पकड़ लेता है, जगत विख्यात हो जाता हैं, कोई भी संसार का ऐसा कार्य नहीं होता, जिसको कि वह पूर्ण न कर सके। इतिहास के पन्ने उसके चरित्र लेखन के लिए लालायित रहते हैं। किन्तु अगर वह दुराचारी हुआ तो पतन के गर्त में जा गिरता है, कृमि-कीट की तरह मर जाता है और दुनिया में उसका कोई नाम लेवा नहीं रहता। सदाचारी पुरूष चिरंजीवी होता है। उसका जीवन सुखमय व्यतीत होता है। किन्तु दुराचरी पुरूष अस्वस्थ रहता हेै। रो्ग उसका पीछा नहीं छोड़ते। जीवनपर्यत वह दुखी रहता है। क्षणिक सुख उसके तमाम जीवन को करूण बना देता है।
संसार में जितने प्राणी हैं, सभी में भगवान भरे हैं, वे सब भगवान की ही विविध अनन्त अभिव्यक्तिां है। अतएव सब में भगवान को देखते हुए, किसी भी प्राणी का जरा भी अहित न करके, सबके कल्याण की भावना करते हुए भगवत्प्रााप्ति के मार्ग पर अग्रसर होते चले जाओ, पर यह निरन्तर समझते रहो कि ये सब यात्रा के साथी मात्र हैं। इनसे यहां का जो सम्बन्ध है, यह यथार्थ नहीं है। अत: इनके साथ इनके हित का निर्दोष व्यवहार करो- सबकी यथासाध्य सेवा करो। कहीं भी किसी में भी न तो आसक्ति करो और न किसी से द्वेष ही करो। भगवत् सेवा की शुद्ध भावना रखों। फिर तुम्हाराा प्रत्येक कर्म ही भगवान् की पूजा बन जायेगा और तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा।
मानव-जीवन की सफलता ऊंचा अधिकार, विपुल धन-वैभव, संसार में अपार यश कीर्ति और बड़ी से बड़ी जागतिक सफलता की प्रापित में नहीं है। यदि ये सब परिस्थितियां और पदार्थ भगवान से विमुख करने वाले है तो इनका प्राणघातक मीठे विष या मित्र बनकर धोखे से मार डालने वाले शत्रुु की भांति त्याग या विनाश ही श्रेयस्कर है।