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KuldeepKhare
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अर्थव्यवस्था पर सवाल उठाकर यशवंत सिन्हा ने एक नई बहस छेड़ दी है। सिन्हा ने वित्त मंत्री अरुण जेटली पर अर्थव्यवस्था का कबाड़ा करने का तीखा आरोप लगाया है। सिन्हा के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसलिए क्योंकि वे न तो विपक्ष के नेता है और न भाजपा के विरोधी। सिन्हा अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार में वित्त मंत्री रह चुके हैं। सिन्हा नोटबंदी की खामियों से लेकर जीएसटी की कमियों की तरफ तीखे अंदाज मे इशारा किया। सिन्हा पहले ऐसे भाजपा नेता हैं जिन्होंने देश्ा की अर्थव्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले भी सिन्हा भाजपा नेतृत्व पर तीखे हमले करते रहे है। लेकिन अब पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है। अर्थव्यवस्था की कमजोर होती सेहत को लेकर विपक्ष मोदी सरकार पर पहले ही हमलावर हो रहा है। ऐसे में सिन्हा के भी विपक्षी सुर में बोलने को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यहां सवाल सिन्हा के तीखे शब्दों का नहीं। सवाल आम आदमी का है। अगर देश की जीडीपी गिर रही है। युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहे हैं तो सिन्हा ही क्यों भाजपा के हर नेता को चिंतित होना चाहिए। सब जानते हैं कि खुशहाली न तो नारों से आती है और न ही चुनावी वादों से। खुशहाली का सीधा अर्थ महंगाई, रोजगार और विकास के साथ जुड़ा है। लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने सत्ता में आने पर पांच साल में 10 करोड़ लोगों को रोजगार मुहैया कराने का वादा किया था। अगर वो वादा पूरा नहीं हो रहा तो सवाल तो उठेंगे ही। अपने भी उठाएंगे और पराए भी। जरूरत इन सवालोें का जवाब देने की है। दो दिन पहले हुई भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी नेतृत्व ने सांसदों-विधायकों से जनता का सेवक बनकर काम करने की सलाह दी हैं। ये बात सांसद-विधायकोुं पर ही नहीं सरकार पर भी लागू होती है। सरकार भी अपने आपको जनता का सेवक मानते हुए काम करे। महंगाई की मार झेल रही जनता को भी राहत पहुंचाए और रोजगार की तलाश में भटक रहे युवाओं को भी। अन्यथा कल सिन्हा की जगह पार्टी का कोई दूसरा नेता और फिर हर नागरिक अर्थव्यवस्था के चौपट होने की बात कहने लगेगा।