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ShravanVishwakarma
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मनुष्य के अंतर्मन को जो क्रियाएं प्रभावित करती हैं उनमें भय, भ्रम और संदेह महत्वपूर्ण है। इसके अतिसिक्त काम, क्रोध, लोभ और मोह का भी महत्वपूर्ण प्रभाव शरीर के अंतर्मन पर पड़ता है, जो शरीर को यानी मनुष्य के संपूर्ण चरित्र को प्रभावित करता रहता है। ये मानसिक क्रियाएं शरीर में अनवरत चलती रहती हैं। भय मनुष्य के लिए एक ऐसा अद्दश्य भूत होता है, जो प्रतिक्षण मनुष्य को अदश्य रहकर भी प्रभावित करता रहता है। भय का कभी कोई न तो अस्तित्व होता है और न उसके होने की कोई संभावना रहती है। यह कुझ नहीं होता, लेकिन सब कुझ होने-सा लगता रहता है। यह लगना ही भय है। जिसके होने की जब कोई संभावना ही नहीं होती तो इस लगन को ही जब हम सत्य मानने का भ्रम पालने लगते है तो वही भ्रम सत्य होने का अभास देने लगता है और हमारे शरीर की संपूर्ण जैविक प्रक्रिया को प्रभावित करने लगता है। भय और भ्रम में मुख्य रूप से अंतर यही होता है कि भ्रम क्षणिक होता है, जो एक क्षण में ही हमारे शरीर में भय पैदा कर लुप्त हो जाता है। इसी प्रकार भ्रम हमारे मन में अनिश्चय पैदा करता है और इस अत्तिश्चय को मन पूरी तरह पकड़कर भयग्रस्त हो जाता है। भय, भ्रम की तरह क्षणिक नहीं होता।
यह जब मन में बैठ जाता है तो आसानी से नहीं निकलता, लेकिन वास्तविक स्थिति यह है कि न तो भ्रम का कोई अस्तित्व होता है और न भय का । दोनों मानसिक कल्पना की उपज हैं। संदेह भी मानसिक कल्पना की ही उपज है। जिस प्रकार भय और भ्रम का कोई अस्तित्व नहीं होता उसी प्रकार संदेह का न तो कोई आधार होता है और न कोई प्रमाण होता है। यह स्वतः मन के विकारों से उत्पन्न होता है और मन कि ग्रंथियों को बुरी तरह जकड़ होता है, जिससे मनुष्य का पूरा चरित्र कुंठित होने लगता है और कुंठाग्रस्त मनुष्य किसी काम का नहीं होता। भय, भ्रम और संदेह के कारण जब मनुष्य का चरित्र पूरी तरह प्रभावित हो जाता है तो वैसे ही लोग कुंठाग्रस्त हो जाते हैं। कुंठाग्रस्त व्यक्ति अपनी सारी क्रियाशीलता, कर्मठता और संकल्प, तोनो को गंवा बैठता है।