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rajendrasinghpatel


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हनशीलता मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ गुण है। विपरित परिस्थियों में भी व्यवहार संतुलित बना रहे, यह बड़ा तप है। सूत्र रूप में यदि समझें तो किसी भी प्रकार के नकारात्मक अथवा सकारात्मक अतिरेक से अप्रभावित रहना सहनशक्ति का प्रमाण है।व्यावहारिक रूप से ऐसा कर पाना अति दुष्कर है। नकारात्मक सोच के सामने आते ही मनुष्य क्रोध और अहंकार से भर उठता है और प्रतिवाद में ऐसे कदम उठता है जो सभ्य समाज को स्वीकार्य नहीं होते। इससे पाप और अपराधों का जन्म होता है। सकारात्मक स्थितियों में व्यक्ति के अंदर को लोभ, मोह और वासनाएं प्रबल हो जाती है। इनसे भी पाप और अपराध ही जन्म लेते हैं। दोनों ही स्थितियों में मनुष्य को दण्ड का भागी बनना पड़ता है। इनसे बचने का एक ही उपाय है कि मनुष्य स्थितियों के हाथ की कठपुतली बनकर उन्हें स्वयं को सिध्द करने का ईश्वर प्रदत्त अवसर समझे। विपरित परिस्थितियों में वह ईश्वर के न्याय पर भरोसा रखे। जो कुछ उसके साथ घटित हो रहा है उसके रहस्य को वह नहीं जान सकता। यह ईश्वर का नियोजन है। हो सकता है कि उसके किन्हीं पूर्व जन्म के पापों का फल मिल रहा हो। यह भी सम्भव है कि उसे सत्य के मार्ग पर लाने की प्रताड़ना और चेतावनी हो। ईश्वर यदि किसी को सफलता प्रदान कर रहा है तो यह उसके पुण्य कर्मों का पुरस्कार हो सकता है। इससे यदि अहंकार, लोभ, वासनाएं पैदा होने लगें तो पुरस्कार का प्रयोजन लुप्त हो जाता है। मनुष्य को जो मिल रहा है, वह आगे बाटने के लिए होता है। प्रकृति में सर्वत्र यही तो हो रहा है। नदियों ने अपने जल पर, सूर्य, चंद्रमा ने अपने प्रकाश पर, वायु ने अपने प्रवाह पर कोई रोक नहीं लगाई। कदाचित इसीलिए सृष्टि के आदिकाल से ऐसा ही होता चला रहा है और बांटने वाले का भंडार कभी खाली नहीं हुए। जब मन विकारों से ऊपर उठ जाए और परमात्मा की सत्ता में रहना सीख ले तभी सहनशीलता का गुण विकसित होता है। सहनशीलता कायरता नहीं है। विकारो को जीत लेना अतुल शौर्य रपक्रम है। संसार में मनुष्य अपनी सत्ता स्थापित करने नहीं आया है। उसके जन्म का उद्देश्य परमात्मा के संरक्षण में अपने सारे पापों को धोकर आत्मा को पावन बनाना है। इसी में वास्तविक आनंद निहित है।
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