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IbneyAli
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कर्नाटका और तमिलनाडु की सरकारें आपस में ऐसे टकराती रही हैं जैसे वे दोनों एक ही देश की दो राज्य सरकारें नहीं बल्कि दो देशों की आजाद सरकारें हों उनके तेवर दो स्वतन्त्र और सम्प्रभू सरकारों के तेवरों से मिलते जुलते हैं। पानी के सवाल पर जिस तरह इन सरकारों का रक्तचाप बढ़ रहा है उससे एक बात तो साफ है कि उनकी आंख का पानी मर चुका है। उनका आचरण श्रद्धावानपूर्ण पड़ोसी राज्य सरकारों के समान न होकर संकुचित और संकीर्ण लड़ाकू पड़सियों की शैली लिए हुए है कावेरी जल विवाद का फैसला करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा न्यायिक आयोग की अन्तरिम संस्तुति को नहीं मानने और जबरदस्ती मनवाने की परस्पर विरोधी जिदें लेकर प्रदेशव्यापी बंद और अध्यादेश जारी करने जैसी कार्यवाही से जो खुली लड़ाई शुरू हो गई है उसकी आग अन्य राज्यों में भी फैल सकती है। हमारे देश की अधिकाँश नदियाँ कई राज्यों से होकर प्रवाहित होती है। नदियों की इस अन्तर्राज्यीय व्यापकता ने हमारे देश को एक अर्से से जोड़े रखने का काम किया है। हमारी सभ्याता का विकास इन्ही नदियों के तट पर हुआ। नगरीय जीवन प्रणाली भी नदियों के तट पर ही विकसित हुई है। जो नदियां एक समय देश को जोड़ने का काम करती थी वही आज संबंधों को तोड़ने का कारण बनें यह कोई जिम्मेदार देशवासी कैसे सहन कर सकता है। पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच सतलज और व्यास के जल का विवाद, गुजरात और मध्य-प्रदेश के बीच नर्मदा जल विवाद तथा कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल विवाद एक के बाद एक जुड़ती वे कड़ियाँ हैं जो धीरे-धीरे अन्तर्राज्यीय विवाद की सीमाये लांघ कर राष्ट्रीय विवाद का रूप ले सकती है। भारत सरकार ने इस समस्या का हल निकालने के लिए केन्द्रीय जल आयोग का गठन किया था। जैसे-जैसे कृषि, उद्योग एवं बढ़ती आबादी के कारण पीने के लिए पानी की अवश्यकता बढ़ती जा रही है, प्रत्येक राज्य के स्थानीय प्रशासन जल आपूर्ति के माध्यमों का दोहन बढ़ाता जा रहा है। स्वाभाविक रूप से जलापूर्ति वहाँ अधिक होगी। जहाँ से उसका उद्गम है, यदि गंगा और यमुना के जल का उत्तर प्रदेश अपनी पूरी आवश्यकता के अनुरूप उपयोग करना शुरू कर दे तो उसका असर न केवल बिहार और बंगाल, हरियाणा अपितु बांगलादेश पर भी पड़ने लग सकता है।
भारत बाँगलादेश के बीच फरक्का परियोजना पर उठे विवाद का जो अन्तर्राष्ट्रीय निपटारा हुआ है उसमें गंगा के उद्गम से उसके सागर में मिलने तक कितने क्यूसेक जल किस राज्य में नहरों आदि के माध्यम से निकाला जा सकेगा इसका एक व्यापक समझौता हुआ है जिसके कारण अनेक योजनाओं को पुनरीक्षित करना पड़ा है। कावेरी का कितना जल किस राज्य को मिले इसका फैसला करने के लिए केन्द्रीय सरकार ने जिस आयोग का गठन किया है उसने अंतिम निर्णय के पूर्व एक अन्तरिम निर्णय दे दिया है तमिलनाडु सरकार का दबाव है कि केन्द्रीय सरकार इस फैसले पर अमल सुनिश्चित कराये। कर्नाटका सरकार चाहती है कि अन्तरिम फैसले तक पानी में ही पड़ा रहे कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक की सहयोगी सरकार। कहाँ तो हम प्याऊ बैठा कर पानी पिलाया करते थे लोग कल्याणकारी अवधारणा पर सरकारों के गठन के बाद प्याऊ तो बंद हो ही गये थे, अब सरकारों ने एक दूसरे राज्यों को जलापूर्ति भी बंद करना शुरू कर दिया है ताकि पड़ोसी राज्य प्यासा मर जाये, उसकी खड़ी फसलें सुख जायें। माननीय प्रधानमंत्री नरसिंहराव को कावेरी जल विवाद की उग्रता को रोकने और अन्तर्राज्यीय नदियों के जल उपयोग के लिए सम्यक नीति निर्धारित करने की दिशा में तत्काल कदम उठाना चाहिए।