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SantoshKumar2997
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दीपावली के लक्ष्मीपूजन का पर्व है। इस अवसर पर लोग मां लक्ष्मी की से इसकी प्रार्थना करते हैं कि घर में सुख-समृद्धि आए। जिनके घर में सुख-समृद्धि आ जाती है वे यह मानते हैं कि उनकी पूजा-अर्चना स्वीकार हो गई । जो वंचित रह जाते हैं वे ईस्वर के बजाय अपने में ही दोष खोजते हैं कि शायद हमारी पूजा में ही कोई कमी रह गई। जनतांत्रिक व्यवस्था में भी एक त्योहार आता है जो अमूमन हर पांच साल पर आता है। इस त्योहारको चुनाव कहते हैं। चुनाके समय भी तमदाता जिन्हें वोट देकर जिताता है उनके अपेक्षा करता है कि वे उसके जीवन में खशहाली लाएंगे, पर तमदाता जिन्हें वोट देता है उन्हें भगवान नहीं मानता। िसलिए पांच साल बाद बज वे फिर वोट मांगने आते हैं तो वह अपने में नहीं, खुद के द्वारा चुनी हुई सरकार में खोट निकालता है। पांच साल के काम-काज की समीक्षा के बाद वह तय करता है कि उसे एक और मौका दे या यह जिम्मेदारी किसी और को देना चाहिए। तो गुजरात और हिमाचल में यह त्योहार आने वाला है। हिमाचल के मुकाबले गुजरात का क्षेत्रीय के साथ साथ राष्ट्रीय आयाम भी है। पश्चिम का भारत का यह राज्य भाजपा का अभेद्य दुर्ग बन चुका है। एक ही राज्य है जहां दो पार्टीयों होने के बावजूद भाजपा को पचास फीसदी से ज्यादा वोट मिल चुके हैं। कांग्रेस 27 साल से गुजरात में सत्ता से बाहर है। पूरी एक पीढ़ी तैयार हो चुकी है जिसने कांग्रेस को सत्ता में नहीं देखा।
लंबे समय तक सत्ता में रहने के फायदे और नुकसान, दोनों ही होते हैं। फायदा यह कि आपका काम अच्छा है तो मतदाता बार-बार मौका देता है और आपको काम करने का ज्यादा मौका मिलता है। नुकसान यह कि एक समय के बाद लोग ऊबने लगते हैं और उन्हें लगता है कि बदलाव होना चाहिए। इसके लिए जरूरी नहीं है कि वर्तमान सरकार का काम खराब हो। जैसा कि औडिसा में होने की उम्मीद/आशंका नजर आ रही है। गुजरात विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा, दोनों के लिए राजनीतिक प्रतिष्ठा का ृसवाल है। भाजपा यहां जीतती है तो उसके विरोधियों के हौसले पस्त होंगे और नोटबंदी एवं जीएसटी लागू कनरे से उपजी नारजगी का विमर्श थमेगा। 2019 लोकसभा चुनाव की तैयारी में उसकी राह की मुश्किलें कम होंगी। यहां जीत से यह भी स्थापित होगा कि मोदी गुजरात छोड़कर भले दिल्ली चले गए हों, लेकिन गुजरात के लोगों ने उन्हें नहीं छोड़ा है। अपने गृह राज्य पर ऐसे मजबूत जनाधार वाला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बाद पहली बार आया है। राजीव इंदिरा गांधी के बाद पहली बार आया है। राजीव गांधी का नाम इसमें इसलिए शामिल नहीं है कि वह 1984 में एक विशेष परिस्थिति में जीते ते और 1989 में वह दमखम नहीं दिखा सके थे।
मोदी के गुजरात से दिल्ली जाने के बाद राज्य में दो मुख्यमंत्री आ चुके हैं और हार्दिक पटेल पाटीदारों का बडा आंदोलन चला चुके हैं। पाटीदारों की नाराजगी पूरी तरह ख्तम नहीं हुई है। जिग्नेश मेवानी को दलितों के नेता के तौर पेश किया जा रहै है तो अल्पेश ठाकोर पिछड़ों के नेता बताए जा रहे हैं। अभी तक इनमें से किसी ने अपने समर्थन को वोट में बदलने की क्षमता नहीं दिखाई है या कहें कि इन्हें इसका मौका नहीं मिला है। इन सबकी कांग्रेस के साथ मोर्चा बनाने की बात हो रही है। इतना ही नहीं आदिवासी नेता छोटू भाई वसावा भी इनके साथ हैं। 2001 में के बाद यह पहला चुनाव होगा जब मोदी प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं। नोटबंदी और जीएसटी लागू होने से व्यापारियों में नाराजगी