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ShubhamDeol


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ारत सदैव अपनी गरिमा अलग ही बनाता रहा है। प्राचीन समय में शिक्षा माध्यम, गुरुकुलों का पोषण एवं रक्षा, राजाओं तथा महाराजाओं द्वारा की जाती थी। गुरुकुलों का संचालन तथा विद्यादान विद्वान गुरुओं द्वारा किया जाता था। उन गरुओं का, राजा तथा रंक, यहाँ तक कि समाज का प्रत्येक प्राणी सम्मान करता था और आदर देता था। प्रत्येक वर्ष गुरुपर्व के दिन इन गुरुओं की पूजा अर्चना आदि, शिष्यों द्वारा तो की जाती ही थी साथ ही उन शिष्यों के स्वजनों द्वारा भी बड़ा स्नेह और मान दिया जाता था। वह परम्परा समय के अनुसार बदलती गई। गुरुपर्व का दूसरा रूप शिक्षक दिवस ने ले लिया। गुरूकुलों का स्थान विद्यालयों ने अपनाया। शिक्षा की पद्धति मे भी परिवर्तन होता चला गया। परिवर्तन होना आवश्यक था, कारण, देश-विदेश से सम्पर्क स्थापित करने से ही भारत की उन्नति में निखार सकता था। कर्तव्य परायण शिक्षकों ने भारत के भावी नागरिकों के निर्माण में बड़ा सहयोग दिया। मुझे कहने में संकोच नहीं है आधुनिक दैनिक समस्याओं के कारण हमारे भारत के शिक्षकों के सामने ऐसे-ऐसे कठिन तथा असहाय मार्ग की रक्षा का भार उन प्रान्तों अथवा श्रीमन्तों के कन्धों पर था परन्तु आज उर प्रकार की रक्षा मिलने में रुकावटें गयी हैं। यही कारण है कि कहीं-कहीं शिक्षा का स्तर निम्न कोटि का होता जा रहा है। शिक्षकों को हमारे अभिभावक, धन से खरीदा हुआ समझते हैं। हम विश्व के विषय में अपनी समान विचारधारा, के कारण ही यहाँ उपस्थित हुए हैं। हालाँकि हम सौ से भी अधिक देशों से आए हैं किन्तु हम सब एक मानव परिवार के ही सदस्य हैं। हम चाहते हैं कि हमारे परिवार का जीवन स्तर अच्छा हो। हम नहीं चाहते कि हममें से आधे समृद्ध हों और आधे वंचित हों तथा मेरी यह इच्छा है कि सभी देशों तक विकास, समृद्ध और ज्ञान का प्रकाश पहुँचे। हम भय में नहीं बल्कि स्वतंत्रता के वातावरण में रहना चाहते हैं जहाँ युद्ध की काली छाया मंडराए, सर्वत्र शान्ति व्याप्त हो। वास्तव में यही गुटनिरपेक्षता एक विचारधारा, एक वास्तिकता, एक आन्दोलन है, जिसमें इतिहास का स्वरूप बदलने की शक्ति निहित है। अपने इस आन्दोलन को 25 वर्ष पूरे कर लेने के उपलक्ष्य में हम यहां एकत्र हुए हैं। इस अवसर पर हम सहअस्तित्व, शान्तिपूर्ण वातावरण में सह-विकास सम्मान एवं समानता के आदर्शों को साकार रूप देने का संकल्प करते हैं। मैं, हार्दिक स्वागत और स्नेहपूर्ण अतिथ्य के लिए जिम्वाब्बे के प्रधानमंत्री और निवासियों को धन्यवाद देता हूँ। अब हमारे इस आन्दोलन के अध्यक्ष प्रधानमंत्री श्री मुगावे होंगे जिन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए शौर्यपूर्ण संघर्ष द्वारा अपने देश का नेतृत्व किया। राबर्ट मगावे और जिम्वाब्बे साहस और दृढसंकल्प की उस भावना का प्रतिबिम्ब है जो अफ्रीका और गुटनिरपेक्ष समुदाय में एक नई जान फूंक रही है। हमारा आन्दोलन विदेशी शासन साम्राज्य और उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष की दैन है। इसका उद्देश्य स्वतंत्रता औस समानता की हमारी दृष्टि को नया रूप, आकार एवं आयाम देना है। इस सपने को साकार करने के लिए अनेक व्यक्तियों ने खून पसीना एक किया तथा असीम पीड़ा एवं दुख झेलें। ये वे नेता थे जिन्होंने हमें स्वतंत्रता दिलाई।
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