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anjulsaxena
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पिछले दस वर्षो में देश में खाद्यान्न का उत्पादन 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है। यदि आबादी में वृद्धि न होती, तो खाद्यान्न उत्पादन में यह वृद्धि आश्चर्यजनक होगी। भारत ने 1976 में 11 करोड 80 लाख टन अनाज पैदा किया, लेकिन हमें अधिक अनाज की आवश्यकता है। चावल की अच्छी खेती के लिए जमीन में कम से कम 30 सैंटीमीटर बारिस की आवश्यकता है जिस से जमीन दलदल हो जाए। उत्तरी क्षेत्र में आम तौर पर जुलाई और अगस्त में 30 सैंटीमीटर और सितंबर में 20 25 सैंटीमीटर बारिस होती है। यदि हर समय ऐसा हो जाए, तो अच्छा रहता है परन्तु कई बार बहुत कम बारिस होती है और कई बार बाढ़ ही आ जाती है। पहली स्थिति में धरती प्यासी रह जाती है, बीज मर जाते हैं और सूखा पड़ जाता है। दूसरी स्थिति में फसल बह जाती है और उस के साथ सब कुछ बह जाता है। इन दोनों स्थितियों में किसान और देश दुःखी होते हैं। कम फसल की आशंका से देश चिंतित हो उठता है। चिरकाल में वैज्ञानिक इस समस्या के समाधान के लिए प्रयत्नशील हैं। इन्होंने इस समस्या का समाधान भी खोज लिया है। बारिस के उतार चढ़ाव का असर तब कुछ ज्यादा होता है जब ऐसी फसलें बोई गई हों जिनको पकाने में अधिक समय लगे। अब नया विचार यह है कि ऐसी फसलें बोई जाएं जो जल्दी पक जाएं। ये फसलें यदि जून के अंत में बोई जाएं, तो अगस्त में पक जाती हैं और जुलाई में बोई जाएं, तो सितंबर में पक जाती है। मध्य प्रदेश में जल्दी पक जाने वाली इन फसलों का परीक्षण उल्लेखनीय तौर पर सफल रहा है। आश्चर्य की बात है कि दक्षिणी भारत की अपेक्षा उत्तरी भारत में उर्वरक की खपत कम होती है। इस लिए आवश्यकता इस बात की है कि उत्तरी भारत में यह कमी दूर की जाए। उर्वरको के इस्तेमाल से फसल अच्छी और अधिक होती है, जैसा कि सब किसान जानते हैं। सरकार का कर्तव्य है कि वह किसान को सस्ते मूल्य पर और सुगमता से उर्वरक सप्लाई करें। यदि यह सब किया जाए, तो आशा की जाती है कि ज्यादा उत्पादन होने पर भारत के नागरिक प्रसन्नता महसूस करेंगें। वैज्ञानिक खोज के अनुसार यह अनुमान लगाया गया है कि बारिस के रूप में पृथ्वी पर गिरने वाली समूची नमी का मनुष्य जाति केवल एक प्रतिशत प्रयोग कर रही है और शेष पानी जाया हो जाता है। विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया है कि यदि मुनष्य इस नमी (पानी) के केवल पांचवे भाग का सही इस्तेमाल का ढंग