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SantoshKumar2997
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तुझे क्या आर्शीवाद दू चीरीजिंवी होने को वरदान तो तुझे भगवान स्वंय बह्रा दे चुके है, मुझे इतना ही वरदान दिजिये कि मैं सदा धर्म और निति के मार्ग पर चलू कभी अधर्म के मार्ग पर नहीं चलू । इसका भी वरदान बह्मा से तूम पा चुके हो। ऐसा लगता है कि इन बातों के परदें में तुम अपने धर्म विरूद्द कार्य को छुपाने की चेष्टा कर रहे हो। मैने कोई कार्य धर्म विरूद्द नहीं किया। क्या धर्म हैं क्या अधर्म हैं इसकी व्यख्या देश और काल से अलग अलग होती हैं। नही सत्य एक ही वो है स्थान हर काल मैं एक ही होता है इसलिए इसकी व्यख्या एक ही होती है तुम अच्छी प्रकार जानते हो जीवन मैं कई बार वह अवसर आता है धर्म संकट का समय कहते है उस समय प्रणी का क्या धर्म क्या कर्तव्य है ऐसे ही अवसर पर हर प्राणी अपने अपने संस्कारों के अनुसार ही अपने धर्म का निश्चय करता है ऐसे ही तुमने अपने भाई अपने देश कुल को त्यागना ही अपना धर्म समझा है। मैने भाई कुल और देश के लिये अपने प्राण न्छ्योवार कर रहा हूँ। मैंने अपने भाई को नहीं त्यागा उन्होंने ही मुझे धक्के मारकर बाहर निकाल दिया मैं उनके ही धर्म की बात बता रहा था स्त्री हरण हमारा कार्य नहीं है श्रीराम से युद्द त्याग कर देवी सीता को वापस कर दो और अपने कुल और देश की रक्षा करो मैं उन्हें अधर्म के मार्ग से हठाना चाहता था इस मैं मेरा क्या दोष था । बीभीषण यदि शरीर में कोई रोग या दोष आ जाये तो अपनी भुजा अपने शरीर का त्याग नही करती। भाई - भाई की भुजा होती है भाई से अलग होकर तुने भाई की एक भुजा काट दी अगर इसमें भाई की पराजय हुयी तो इसकी पराजय का कारण तू होगा तू । नहीं मैं उनकी पराजय की नहीं मैं उनकी विजय की बात समझा रहा था मैं उनके लिये श्रीराम की तरफ से संधि लाया था। अब इस समय इस प्रस्ताव तुम्हारे लिये भी लाय हू श्रीराम ने लंका का जो राज्य मुझे दिया है मैं तुम्हें दे दूगा परन्तु आप इस संगार को रोकीये आप भी तो इस दुराचार से सहमत नहीं है बोलिये, हाँ मैं उनसे सहमत नहीं हू तो आप हमारी तरफ आ जाईये दुस्कम दुराचार के लिये अपने बंधु को भी दंण्ड देना अपराध नहीं है इस समय यही आप का धर्म है। अरे.... वीभीषण तू जिसे धर्म कह रहा है उससे बड़ा अधर्म और कोई नही हो सकता आने पीढ़ी तूझे कितना बड़ा धर्माता राम भक्त क्यों न माने परन्तु अपने देश अपने कुल अपने घर से विश्वास घात करने के लिये तुझे कभी सम्मान की दृष्टी से नही देखा जायेगा अरे.... जिनसे मित्रता की उनके आरक्षण से शिक्षा ली होती भाई के लिये भरत के त्याग को देखा होता भाई लक्ष्मण की सेवा और समर्पण से शिक्षा लेता तो तू अपने माथे परएतना बड़ा कलंक नहीं लगाता।
भऱत और लक्ष्मण के पद चिन्ह पर चलने के लिये मार्यदा पुरूसोत्तम राम जैसा भाई भी होना चाहिये अरे.. अच्छे का साथ तो सभी अच्छे रहते है तो भाई –भाई का रिश्ता ही क्या। क्या भईया इस युद्द में अकेले ही मर जायेंगे उनके साथ मरने वाला और कोई भाई नहीं होगा अरे दृष्य तो वह होगा जहां रावण का मृत शरीर होगा होगा उसेक चारों ओर उसके भाईयों के और उसके पुत्र के मृत शरीर रावण की मृत शरीर की शोभा बड़ा रहे होगें। . जाओ अपने स्वामी राम को सावधान कर दो की अब सामना पर्वत के समान अजय कुमक्कड़ से हैं चला जा ...नहीं तो मेरे हाथों से मारा जायेगा। मेरी आँखों से दूर चला जा मुझे अब कुछ नहीं सुझ रहा हैं मेरे आगे से दूर दो जा नहीं तो तू मारा जायेगा ।