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AkashVerma2168
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इसका प्रमुख कारण रहा पुष्प दहल कमल प्रचंड के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) जिसे माओवादी सेंट्रल भी कहा जाता है, का सत्ता में शामिल रहते हुए प्रमुख विपक्षी राजनीतिक दल केपी ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल) से चुनावी गठबंधन करना। राजनीतिक हल्कों और नेपाल की आम जनता द्वारा इस गठबंधन को राजनीतिक अवसरवादिता बताते हुए सवाल उठाए जा रहे हैं कि एक राजनीतिक दल पक्ष और विपक्ष दोनों में एक साथ कैसे रह सकता है? यानी सत्ता में भी है और चुनावी फायदे के लिए विपक्ष से भी गठबंधन में है। उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले पुष्प दहल प्रचंड ने गठबंधन की शर्तों के अनुरूप यह कहते हुए प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया था कि मेरा नौ महीने का कार्यकाल समाप्त हो गया है और देउबा को प्रधानमंत्री बनाने में पूरा समर्थन दिया था। प्रचंड के इस कदम से उनकी लोकप्रियता में काफी इजाफा हुआ था और उन्हें नैतिकवादी बताया जा रहा था। लेकिन, इस गठबंधन ने प्रचंड की उस कुर्बानी को बौना साबित कर दिया और उनकी छवि एक अवसरवादी राजनेता की बना दी।
यूं तो नेपाल में सभी दल चुनावी जोड़-तोड़ की राजनीति में लिप्त हैं। नेपाल में इसी वर्ष अप्रेल-जून में स्थानीय निकाय चुनाव हुए थे। स्थानीय निकाय चुनावो के नतीजों के आधार पर सभी राजनीतिक दल अपने-अपने समीकरणों की तरफ बढऩे लगी। हालांकि इन चुनावों में केन्द्र में सत्तारूढ़ नेपाली कांगे्रस सबसे बड़ा दल बनकर उभरी थी। और वामपंथी दल पूरे नेपाल में खासकर तराई क्षेत्रों में काफी पिछड़ गए थे। प्रमुख मधेशी दल, फेडरेल सोशलिस्ट फॉरम ऑफ नेपाल दूसरा सबसे बड़ा दल बनकर उभरा था। वहीं मधेशियों का दूसरा सबसे बड़ा दल राष्ट्रीय जनता पार्टी (नेपाल) तीसरे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आई। इन नतीजों से वामपंथी दलों में बौखलाहट है। इसी परिपे्रक्ष्य में सभी प्रमुख वामपंथी दलों ने सम्मिलित होकर अपना गठबंधन बनाया।