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सीता का अपहरण करते समय धर्म अधर्म की बात नहीं सोची मन्दोधरी भाभी और बीभीसण की नीति और धर्म युक्त बात नही सोची केवल काम वासना की पूर्ति का बहाना ढूढां है आपने इसी का फल है जो की लंका बासी भोग रहे है एक आचार्य की भाति उपदेश सुनना है तो जायो फिर से सो जाओ हमें तुम्हारी कोई आवश्यकता नही हैं यह समय है संकट का इस समय तुम्हारा क्या कर्म हैं मान लिया भ्रम से नारायण को नहीं पहचाना मान लिया, हमने एक स्त्री का हरण कर लिया, मान लिया अपने गौरव और अहंकार मैं हमने किसी का परार्मश नही माना इस सब बातों की चर्चा करने से इतिहास पीछे नहीं मुड जायेगा जो बीत गया कर्मयोगी उसका शोक नही करते भविष्य की चिन्ता कर्मयोगी नहीं करते हैं। इस समय इस क्षण क्या करना यह आवश्क है निश्चय कर लो अपने भाई के प्रति कर्तव्य है या नही। तुम हमें सास्त्र सुना रहे हो सास्त्र में तो ये भी लिखा है कि यदि भाई पापी हो या भाई ने कोई अपराध भी किया है तो उस संकट में उसका साथ दे तो वही भाई कहलाने लायक है किन्तु भाई वही है जो संकट में साथ खड़ा रहे सहायता करे शिक्षा ना दें । सोच लो रावण के कारण ही सही परन्तु रावण के साथ राक्षस जाति का विनाश हो जाये ये तुम्हें स्वीकार है या नहीं । धर्म का समय नहीं यदि मन मैं कोई संचय हैं तो यदि कर्तव्य का पथ साफ नही दिखाई देता तो युद्द में जाने से कोई फायदा नही हैं जाओ और सो जाओ । भईया आपने मुझे ठीक प्रकार से समझा नहीं मैंने जो कहा एक सच्चा हितेशी होने के नाते ही कहा इसका मुझे अधिकार भी था और कर्तव्य भी इस समय मुझे क्या करना है इसके बारे मैं मेरे न मेरे मन मैं कोई शंका है न मेरे पथ पर कोई अधंकार मैं तो छोटा भाई हू और एक छोटे भाई एक ही धर्म है जबतक जीवित है और स्वस्थ है तब तक बड़े भाई को कोई भी कष्ट नही होना चाहिये उसके जीते जी बड़े भाई को चिन्ता रहे या वो सकंट मैं आ जाये तो छोटे भाई पर धिक्कार है छोटा भाई मित्र भी है और सेवक भी है। कुम्मकरण हमें तुम पर गर्व है तुम राक्षस जाति की नाक हो अब भईया आप युद्द की चिन्ता छोड़ दिजिये मैं आपको वचन देता हूँ। आज सुर्यास्त होने से पहले उस वनवासी राजकुमारों के मस्तक लंका की गली कुचे में से गेंद की भाति पेरों से खेलता हुआ आयूगा जिससे लंका के सगे संबधी इस युद्द मे मारे गये है वे भी उनको ठोकर मार सके यदि मैं जीवित रहा तो आज रात लंका में वियज का उत्सव होगा परन्तु यदि सबकी बात सही निकली वो सचमुच भगवान है तो भी मैं पीठ नही दिखाऊंगा अपने भाई के आन के लिये रण भूमी मैं लड़ता हुआ ही मर जाऊंगा तुम अवश्य ही विजय होंगे तुम्हारे साथ चुतुरंगी सेना तैयारी की जायेगी नहीं भईया मुझे सेना की कोई आवश्कता नही हैं भईया मुझे आज्ञा दो और आर्शीवाद भी दो की मेरे कारण तुम्हारा गौरव ऊंचा हो यदि मैं रण भूमि मैं मारा गया तो फिर उन्हें कोई भी नहीं जीत सकता श्रीराम को भगवान मानकर उनकी शरण मैं चले जाना जिससे हमारा कुल और परिवार और आप तो बच जायेंगे । आप का राज्य अंकठ हो जाये । प्राणी जीबित हो तो बैठकर तभी वह प्रसन्न होता है यदि तुम जैसे भाई नहीं रहे तो तीनों का सामारज्र किस काम का .......।