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NavneetBhardwaj2696
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आज मानव अपने अवगुणों को न देखकर दूसरों के अवगुणों को ज्यादा देखता है। ऐसी निम्न सोच और लोगों ने नफरत, द्वेष और कलंक का वातावरण निर्मित कर रखा है। ऐसे दुर्जन चरित्र के लोग दूसरों का अनिष्ट करने में ही रस लेते हैं। ऐसे नकारात्मक लोग ही दुनिया को नष्ट कर रहें हैं। इस तरह के भ्रष्ट चरित्र वाले अपना नुकसान तो करते ही हैं, दूसरे को भी नष्ट करना चाहते हैं। उनका मस्तिष्क असंतुलित होता है उसमे नकारात्मकता अधिक सक्रिय होती है। इसी चारित्रिक दुर्बलता के कारण हमने अपने दोष देखने बंद कर दिए हैं और पड़ोसियो और परिचितों के छिद्रान्वेषण में जुट गए हैं। परिणाम हमारे सामने है। बुराई का परिणाम कभी अच्छा नहीं हो सकता । यदि हम सुख-शांति और आत्म-विकास के मार्ग पर अग्रसर होना चाहते हैं तो हमें विधाता के बताए अनुसार चलना होगा। हमें परदोष दर्शन पर अंकुश लगाना होगा और अपने दोषों पर सदा गिद्ध दृष्टि रखनी होगी। हमारे जीवन में आत्म निरीक्षण और आत्मशोधन का प्रमुख स्थान है। आगमवाणी में वर्णित है कि अपने से अपने को देखो। जब तक हमारा चिंतन परदोष पर केंद्रित रहता है तब तक हम अपने जीवन की गहराई में प्रवेश नहीं कर सकते अर्थात अपनी कमियों को नहीं देख सकते। अपने स्वयं के सुधार और बदलाव के लिए स्वदोष दर्शन रिहायत ही जरूरी है। उसके बिना जीवन के समग्रता को नहीं पाया जा सकता। यही वह स्थिति है जिससे हम अपनी विवशताओं और दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। इसका कारण यह है कि आमतौर पर हर व्यक्ति को अपना बड़ा दोष भी छोटा और दूसरों का छोटा दोष भी बड़ी दिखाई देता है। दोष दर्शन के संबंध में राजनीति और धर्मनीति की दिशा बिल्कुल भिन्न हो जाती है। जो दूसरों के दोषों का दर्शन और विवेचन करने की मामर्थ्य कुशलतापूर्वक रखता है वह राजनीति में पंडित समझा जाता है, परंतु धर्मनीति के अनुसार विद्वान उसे ही समझा जाता है जो अपनी दुर्बलता का शोधन और विवेचन करने की छमता रखता है। इसलिए एक साधक और आत्मान्वेषी से यही अपेक्षा की जाती है कि वह आत्मा की शुद्धि के लिए परदोष दर्शन के मार्ग का परित्याग कर स्वदोष दर्शन के मार्ग का अनुगामी बने। इसी में ही उसका कल्याण है।