words per minute
19
user1387054
00:00
Speed
हमारा तिरंगा हमारे देख भारत के गौरव और स्वाभिमान का प्रतीक है। बहुत बड़े संघर्ष के पश्चात इसे हमने अपनी राष्ट्रीय पहचान के रूप में अपनाया था। तनिक कल्पना करें जब उस देख में 563 रियासतें थीं और उन सबके अपने-अपने अलग-अलग झण्डे थे, तब उन सब झण्डों के ऊपर ब्रिटिश यूनियान जैक इस देख की राजधानी दिल्ली के लालकिले पर फहराया करता था। हमारे विभिन्न झंडों को देखकर अंग्रेज हमारे विषय में कह दिया करते थे कि इस देख में कभी भी राष्ट्रीय एकता नही रहा। हमारे स्वतंत्रता सैनानियों ने इस स्थिति को परिवर्तित करने के लिए संघर्ष का बीड़ा उठाया। सदियों के संघर्ष के पश्चात हमारे नेताओं ने आजादी प्राप्त की तो अपना तिरंगा एक राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया गया। 22 जुलाई 1947 को हमारा यह राष्ट्रीय ध्वज स्वीकर किया गया था। हमने एक राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार करके विश्व को यह संदेश दिया कि हम सब एक थे, एक हैं और एक रहेंगे। स्वतंत्रता संघर्ष के काल में इस सबका लक्ष्य एक था-देश को स्वतंत्र कराना, स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमारा लक्ष्य एक है-देश की आजादी को सुरक्षित रखना और भविष्य में भी एक ही लक्ष्य होगा-देश की स्वतंत्रता की सुरक्षा करते रहना। अपने इसी संकल्प की पूत्र्ति के लिए देश का जन-जन समर्पित हो उठा और देश ने स्वतंत्र होते ही एक पल का भी प्रमाद किये बिना अपना यात्रापथ निर्धारित कर उस पर बढऩा आरंभ कर दिया। अपने झण्डे के प्रति लोगों में कितना श्रद्घाभाव रहा है और यह श्रद्घाभाव कैसे हमारी देशभक्ति का महानायक बन गया था, इसके अनेकों उदाहरण हमारे इतिहास के पृष्ठों को आज गौरवान्वित कर रहे हैं, उन्हें खोलकर यदि देखा जाए तो जेएनयू में राष्ट्रद्रोही नारे लगाने वालों को अपने किये पर अपने आप ही पश्चात्ताप होने लगेगा। बात 1923 की जून की है। कांगे्रस का सत्याग्रह चल रहा था। नागपुर के लिए एक विशेष कार्यक्रम में उपस्थित होकर इस सत्याग्रह को सफल बनाने हेतु जाने वालों का क्रम बढ़ता ही जा रहा था। माखनलाल चतुर्वेदी भी इस सत्याग्रह में सम्मिलित होने हेतु 17 जून को वहां पहुंच गये थे। वहां से उन्होंने अपने भाई को एक पत्र लिखा। जिसमें उन्होंने लिखा था कि- आज नागपुर में भयंकर सख्ती है, जिन्होंने जुर्माने नही दिये, देहातों में उनके घर की चीजें नीलाम की जा रही हैं। उन्हें यंत्रणायें दी जा रही हैं। गाय-बैल, खटिया-पलंग जो मिलता है नीलाम किया जा रहा है। सत्याग्रही स्वयंसेवक रेलों में टिकट नही पाते। 50-50, 60-60 मील की पैदल यात्रा करके स्वयं सेवक आ रहे हैं। मार्ग में वे रोके जा रहे हैं और उन्हें तकलीफ दी जा रही है। तार जाने नही दिये जाते। चिट्ठियां खोली जाती हैं। सफेद टोपी और झंडे वाले पकड़े जाते हैं। नगर में खूब उत्साह है, पकड़ लिये जितने उससे अभी दस गुने बलिदान होने आगे बढ़ते हैं। रात को सभा हुई। मैं सभापति था। जवाहरलाल जी, टंडन जी और मैं तीनों बोले। उपस्थिति 15 हजार थी। सभापति ने व्याख्यान में घरों में झंडा लगाने को कहा। आज नागपुर में झंडे ही झंडे दिख रहे हैं। यह