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SantoshKumar2997
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सुबह के 6 बज चुके थे, समय हो चला था दुकान खोलने का। सुखीराम नें अपने किराने की दुकान का शटर खोला; शटर की आवाज़ से वहां आस पास के लोग यह जान जाते थे कि सुखीराम की दुकान खुल गयी है। अभी तड़के दुकान खोली ही थी कि एक लड़के नें सुखीराम को आवाज़ लगाते हुए पूछा …. बाबा दूध की थैली है क्या ? सुखीराम नें धीमे स्वर में कहा नहीं बेटा अभी कहाँ, अभी 7 बजे तक दूध की गाड़ी आयेगी तभी दूध मिल पायेगा। तड़के जागना और भोर में पदयात्रा करना जिसे अंग्रेजी में वॉकिंग भी कहते हैं, लोगों को बहुत भाता था। थोड़ी ही देर में कई बुजुर्ग और जवान सुखीराम के दुकान की ओर से निकलते हुए जा रहे थे मॉर्निंग वॉक पर। जो भी सुखी को देखता “राम राम” कहकर निकलता; छोटे व् जवान बच्चे “प्रणाम बाबा” बोलकर जाते। विगत कई वर्षों से सुखीराम की सुबह ऐसी ही होती थी। समय के पाबंद सुखीराम अपनी 60 वर्ष की आयु में भी दुकान खोलने में तनिक भी देरी न करते, उनके लिए 6 बजना मतलब दुकान पर हाजिर होना था। दुकान खोल, साफ़ सफाई में व्यस्त सुखीराम को उनकी सबसे बड़ी बेटी ‘रीता’ नें आवाज़ लगायी बाबूजी चाय बन गयी लाऊँ क्या आपके लिए ? हाँ बेटी ला दे, सुखीराम बोले।
मोहल्ले के ही एक वरिष्ठ व्यक्ति “पारसनाथ” सुबह सुबह सुखीराम की दुकान पर आ धमके और फिर हमेशा की तरह ताने मारते हुए कहा – क्या सुखी, बड़ी बेटी की तो शादी नहीं की अब क्या मझली और छोटी बेटियों को भी सारी उमर कुँवारा ही रखोगे ? अरे कम से कम अपने पिता होने का फ़र्ज़ तो अदा कर दो; क्या होगा इन तीनों बेटियों का जब तुम दुनियां में नहीं रहोगे ?? तभी बड़ी बेटी रीता नें चाय रखते हुए सुखीराम से कहा – बाबूजी चाय लो। पारसनाथ भी ब्रेड और अंडे लेकर अपने घर को चल दिए। बेटी रीता नें सुखीराम से सवाल पूछते हुए कहा – बाबूजी आप पारसनाथ को जवाब क्यों नहीं देते ? उनको क्या पड़ी है हमारी शादी की, हम कौन सा उनपर निर्भर हैं ? उनका यूँ रोज-रोज आपको टोकना हमें अच्छा नहीं लगता। सुखीराम नें सहजता से उत्तर दिया – बेटी वो भी तो ठीक कह रहे हैं। कब तक तुम तीनों शादी नहीं करोगी। एक लड़की के लिए अकेला रहना कितना कष्टदाई है। अंदर से अन्य दो बेटियां भी दुकान में आकर बोलीं..बाबूजी हमें कोई कष्ट नहीं है और न होगा कभी। शादी न करने का फैसला हमने सोच समझकर लिया है। मझली बेटी “चंदा” और छोटी बेटी “तारा” को समझाते हुए सुखीराम फिर बोले – अरी, कम से कम तुम दोनों तो शादी के लिए हाँ कर दो। पिता हूँ तुम तीनों का मेरे भी कुछ अरमान हैं और फिर मेरे मरने के बाद तुम तीनों कैसे रहोगी; समाज तो हमेशा ही बहू-बेटियों पर गन्दी नजरें रखता है; कौन हिफाजत करेगा तुम्हारी। आज तुम्हारी माँ “गायत्री” जीवित होती तो क्या अब तक तुम तीनों बिन ब्याही रहती। वो बोल कर गई थी मुझसे की बेटियों की शादी कोई अच्छा वर देखकर कर देना। पर तुम तीनों नें मेरी एक न सुनी; पारसनाथ नें क्या गलत कहा ? उन्होनें सब सच ही तो कहा। सुखीराम नाराज होकर चाय हाथ में लिए अंदर घर में चले गए।