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Abhishekrock
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देश में स्त्री पुरुष जनसंख्या के हिसाब से भी बराबरी पर नहीं है। भारत सरकार और राज्य सरकारो ने अपने अपने स्तर पर इस स्तिथि से निपटने के लिए कई प्रकार से प्रयास किये है।लेकिन पिछले 20 वर्षो का देश के लिंगानुपात में महिलाओं की संख्या कम होने के कारण और उनसे निपटने के अब तक के किये गए सम्मलित प्रयासों का एच एन मीणा का अध्ययन /अनुभव यह कहता है कि जब तक हम सब इस घृणित बुराई के खिलाफ खड़े नही होंगे इससे मुक्ति संभव प्रतीत नहीं होती और इसके लिए हमें देश भर में आंदोलन चलाने की जरूरत है। देश की सरकार, बहुत सारे सरकारी गैर सरकारी संगठन और लोगो के व्यक्तिगत प्रयास जारी है। एच एन मीणा व् डॉ हेमलता मीणा दोनों पति -पत्नी इस पुनीत कार्य में कई वर्षो से लगे है हमा हिंदुस्तान की आजादी के बाद की पहली जनगणना जो सन् 1951 में हुई ,के आंकड़ो के अनुसार प्रति हज़ार पुरुषो पर 946 महिलाएं थी उस समय ,लेकिन अफ़सोस आजादी के दशको बाद भी यह आंकड़ा प्रति हज़ार पुरुषो पर 940 महिलाओं पर ही सिमट के रह गया है। देश में सन् 2011 की जनगणना के अनुसार 3.73 करोड़ महिलाएं कम है ,कुल देश की जनसँख्या 121 करोड़ में से। देश में 0-6 आयुवर्ग में लिंगानुपात सन् 1991 की जनगणना के आकड़ो के अनुसार 945 था जो घटकर सन् 2001 की जनगणना में 927 पर आ गया और यह सन् 2011की जनगणना के आकड़ो के अनुसार 918 पर आ गया।यह आंकड़े देश में लिंगानुपात की विषम होती चिंताजनक स्तिथि को दर्शाते है।यदि हालात यही रहे तो आने वाले वर्षो में स्थिति और चिंताजनक हो सकती है। देश में स्त्री पुरुष जनसंख्या के हिसाब से भी बराबरी पर नहीं है। भारत सरकार और राज्य सरकारो ने अपने अपने स्तर पर इस स्तिथि से निपटने के लिए कई प्रकार से प्रयास किये है।लेकिन पिछले 20 वर्षो का देश के लिंगानुपात में महिलाओं की संख्या कम होने के कारण और उनसे निपटने के अब तक के किये गए सम्मलित प्रयासों का मेरा अध्ययन /मेरा अनुभव यह कहता है कि जब तक हम सब इस घृणित बुराई के खिलाफ खड़े नही होंगे इससे मुक्ति संभव प्रतीत नहीं होती और इसके लिए हमें देश भर में आंदोलन चलाने की जरूरत है। देश की सरकार, बहुत सारे सरकारी गैर सरकारी संगठन और लोगो के व्यक्तिगत प्रयास जारी है। एच एन मीणा एवं उनकी पत्नी डॉ हेमलता मीणा दोनों पति -पत्नी इस पुनीत कार्य में कई वर्षो से अपनी श्रद्धानुसार ,किसी से कोई चंदा उगाई के बिना सिर्फ अपने वेतन में से एक हिस्सा खर्चा करके बेटियों को बचाने की दिशा में लोगो को जागरूक करने की कोशिश कर रहे है। कई वर्षो में अब तक इन्होंने इस कार्यक्रम को बिना किसी से वित्तीय सहयोग के चलाया है विभिन्न रूपों में। मीणा दंपति कहते है कि जब तक देश से यह लिंगानुपात की खाई मिट नहीं जाती उनका हर स्तर पर यह प्रयास सरकारी नौकरी की व्यस्तताओं के बीच भी रविवार आदि छुट्टी के दिनों में जारी रहेगा बेटियो को बचाने के लिए।