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AjayKumar9278
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वर्तमान सरकार जल्दी से जल्दी कृषि पर निर्भरता कम करके लोगो को उद्योगों में लगाने के लिए तत्पर है, संकल्पबद्ध है, उतावली है। वह जानती है कि प्रदेश की सारी श्रम-शक्ति खेतो में नहीं लग सकती, उसका दूसरा उपयोग जल्दी से जल्दी तलाश करना होगा क्योंकि श्रमशक्ति ही प्रदेश को उन्नत और समृद्ध कर सकती है। यह ऐसा साधन है जिसका अपव्यय या जिसकी उपेक्षा प्रगति के रास्ते में बाधक है।
औद्योगीकरण की दौड़ में उत्तर प्रदेश, म.प्र., बिहार, राजस्थान के पिछड़ जाने का एक बड़ा कारण ऐतिहासिक है। अंग्रेज बम्बई, कलकत्ता, मद्रास पर आकर टिके तो आस-पास के क्षेत्रों के औद्योगिक विकास को प्राथमिकता मिली, वहाँ औद्योगिक विकास का वातावरण बना किन्तु उत्तर प्रदेश एवं अन्य राज्य अंग्रेजों की ऑखों के कॉटे थे। सन् 1857 के पहले स्वतन्त्रता संग्राम से लेकर सन् 1947 तक आजादी के हर तरह के आंदोलन में उत्तर प्रदेश एंव अन्य राज्य अग्रणी थे। उसकी सजा उसे आर्थिक उपेक्षा के रुप में मिली। यहाँ के फलते-फूलते उद्योग भी नष्ट कर दिये गये, नये उद्योग लगाने की बात ही नहीं उठती थी।
आजादी के बाद सरकार ने औद्योगिक विकास की ओर ध्यान दिया पर प्रदेश की साधनहीनता, उद्यमी मिजाज व औद्योगीकरण की हवा का अभआव और कल-कारखाने लगाने के लिए आवश्यक पूर्व शर्तों के पूरा न होने के कारण इस दिशा में प्रगति धीमी रही। जैसे- जैसे सुविधाएं बढ़ती गयीं, साधन बढ़ते गये, उद्यम का मिजाज बनता गया, औद्योगीकरण की हवा भी बनती गयी, नये-नये कल कारखाने लगने लगे। इन कारखानों ने उचित वातारवण बनाने में मदद दी। खेती पर निर्भरता कम होने लगी, अब जो रणनीति अपनायी गयी है उसमें बड़े विराट कारखानों से लेकर झोपड़ी के छप्पर के नीचे लगने वाले उद्योगों तक एक साथ विकास हो रहा है। बड़े उद्योगों के लिए उद्योगपतियों को तो राजी किया ही जा रहा है, केन्द्रीय सरकार से भी सार्वजनिक क्षेत्र के ज्यादा से ज्यादा कारखानें लगाने का भी अनुरोध किया जा रहा है।